हे राधे, यह शरीर क्यों इतना क्लेश देता है?

हे राधे,

यह शरीर क्यों इतना क्लेश देता है?

हर श्वास जैसे किसी अधूरी तपस्या का बोझ ढोती है,

हर धड़कन जैसे किसी अनकहे अपराध की सज़ा हो।

मन थक गया है इस देह की सीमाओं से,

इन इच्छाओं की धूल से,

इन स्मृतियों की आग से

जो हर रात भीतर जलती रहती है।


कभी सोचता हूँ

अपने पूरे अस्तित्व को अबीर से ढक लूँ,

रंगों में विलीन हो जाऊँ,

जैसे फाल्गुन की हवा में खो जाती है कोई बाँसुरी।

पर नहीं राधे,

अबीर तो रंगीन है,

उसमें आकर्षण का छल है,

उसमें स्पर्श की प्यास है,

उसमें मोह की मीठी बेड़ियाँ हैं।

डरता हूँ —

कहीं मेरे भीतर फिर कोई वासना न जाग उठे,

कहीं उसकी आँखों में भी फिर कोई प्रतीक्षा न जन्म ले।


इसलिए सोचता हूँ

भस्म से रंग लूँ स्वयं को।

राख की उस शांति से

जो हर अग्नि के बाद बचती है।

पूरा का पूरा शरीर,

माथे से चरणों तक,

स्मृतियों से आत्मा तक।

ताकि कोई पहचान शेष न रहे,

न सौंदर्य,

न चाह,

न अहंकार,

न किसी के लौट आने की आशा।


हे राधे,

मैंने संसार को बहुत पास से देखा है।

यहाँ प्रेम भी व्यापार बन जाता है,

और समर्पण भी अवसर।

लोग मुस्कानों में विष छुपाते हैं,

और संबंधों में स्वार्थ की गाँठें।

मैं थक गया हूँ

इन झूठे उत्सवों से,

इन कृत्रिम रोशनियों से,

इन चेहरों से

जो आत्मा से अधिक दर्पणों को सजाते हैं।


अब मन नहीं करता

किसी सभा में बैठने का,

किसी प्रशंसा को सुनने का,

किसी स्पर्श में अर्थ खोजने का।

अब तो बस

शून्य की गोद में सिर रखकर

कुछ देर मौन रहने की इच्छा होती है।


राधे,

ज्ञान मिल गया है शायद।

यह समझ आ गया है

कि जिसे हम अपना कहते हैं

वह भी समय के साथ पराया हो जाता है।

कि देह केवल मिट्टी का दीपक है,

जिसकी लौ एक दिन हवा में विलीन हो जानी है।

कि प्रेम भी यदि मुक्ति तक न ले जाए

तो वह केवल बंधन है।


मैंने देखा है

कैसे इच्छाएँ मनुष्य को भीतर से खोखला कर देती हैं।

कैसे अपेक्षाएँ

धीरे-धीरे आत्मा का रक्त पीती रहती हैं।

कैसे स्मृतियाँ

रात के अँधेरे में नाग बनकर लिपट जाती हैं हृदय से।

और फिर भी मनुष्य मुस्कुराता रहता है,

जैसे सब कुछ ठीक हो।


पर अब मुझसे यह अभिनय नहीं होता राधे।

अब मैं थक चुका हूँ।

मैंने अपने भीतर के वन में

बहुत समय तक भटक लिया।

अब किसी कदंब के नीचे

बस अंतिम विश्राम चाहता हूँ।


तुम्हारे चरणों की धूल में

अपनी समस्त इच्छाएँ विसर्जित कर देना चाहता हूँ।

मैं नहीं चाहता अब

किसी नेत्र में अपने लिए प्रेम देखना,

न किसी हाथ का सहारा,

न किसी नाम के साथ जुड़ना।

बस इतना चाहता हूँ

कि यह मन शांत हो जाए,

यह भीतर का समुद्र स्थिर हो जाए।


हे राधे,

यदि प्रेम सत्य है

तो मुझे मुक्त कर दो।

यदि भक्ति सत्य है

तो मुझे स्वयं से दूर कर दो।

यदि तुम्हारा नाम ही अंतिम आश्रय है

तो मेरी हर श्वास में उसे बसा दो।


मैं अब वृंदावन की धूल बनना चाहता हूँ,

यमुना के तट की नीरवता,

मंदिर की बुझती हुई दीपशिखा,

या किसी साधु की जपमाला का

अनसुना मंत्र।


मुझे लौटा लो राधे,

इस संसार की भीड़ से परे।

जहाँ न देह का भार हो,

न स्मृतियों की पीड़ा,

न इच्छाओं का शोर।

जहाँ केवल शांति हो,

केवल तुम्हारा नाम हो,

और आत्मा

एक निर्मल आकाश की तरह

अनंत में विलीन हो जाए।


राधे…

अब मुक्ति दो।

इतनी करुणा दो

कि मैं स्वयं को त्याग सकूँ।

इतनी शांति दो

कि भीतर की सारी अग्नियाँ बुझ जाएँ।

और इतनी निकटता दो

कि फिर किसी संसार की आवश्यकता ही न रहे।

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