जब घाव भी अपना चुना हुआ हो और दर्द भी।

 

हाँ,
और शायद
यही सबसे गहरी पीड़ा होती है—
जब घाव भी अपना चुना हुआ हो
और दर्द भी।

हम कुछ कह नहीं पाते,
क्योंकि यह रिश्ता
हम पर थोपा नहीं गया था।
हमने स्वयं
अपने हाथों से
उस इंसान को चुना था।

हमने ही कहा था—
“यही है मेरा प्रेम…”
हमने ही सपने सजाए थे,
हमने ही
अपनों को समझाया था।

अब यदि वही इंसान
बदल जाए,
तो शिकायत भी
अपने ही निर्णय से होती है।

इसलिए
बहुत लोग चुप रह जाते हैं।

वे टूटते हैं,
बिखरते हैं,
रातों को रोते हैं,
पर किसी से कुछ नहीं कहते।

क्योंकि समाज से पहले
उनकी आत्मा
उन्हें कटघरे में खड़ा करती है।

वह पूछती है—
“जब सबने समझाया था,
तब तुमने सुना क्यों नहीं?”

और इंसान
अपने ही उत्तरों के नीचे
धीरे-धीरे दबने लगता है।

कितना कठिन होता है
उस रिश्ते में जीना
जहाँ प्रेम खत्म हो चुका हो,
लेकिन जिम्मेदारियाँ अब भी जीवित हों।

हर सुबह
एक अभिनय करना पड़ता है।

चेहरे पर मुस्कान रखनी पड़ती है,
ताकि बच्चे न समझें,
परिवार न टूटे,
समाज प्रश्न न करे।

लेकिन भीतर—
भीतर एक पूरा संसार
धीरे-धीरे राख हो रहा होता है।

फिर भी
इंसान सब सह लेता है।

क्योंकि वह जानता है—
यह रास्ता
उसने स्वयं चुना था।

और शायद
जीवन की सबसे भारी सज़ा यही है—
अपने ही फैसलों का बोझ
पूरी उम्र उठाना।

लेकिन
हर कहानी केवल दुख नहीं होती।

कई बार
समय के साथ
लोग बदलते भी हैं,
समझते भी हैं,
पछताते भी हैं।

कई रिश्ते
टूटने के किनारे से लौट आते हैं।

और यदि ऐसा न भी हो,
तो भी इंसान
धीरे-धीरे
जीना सीख जाता है।

वह समझ जाता है
कि प्रेम केवल
किसी और से नहीं,
स्वयं से भी करना चाहिए।

क्योंकि
जब इंसान
खुद से प्रेम करना भूल जाता है,
तब दुनिया का कोई भी रिश्ता
उसे पूर्ण नहीं कर सकता।

इसलिए
यदि दर्द मिला है,
तो उसे अपनी हार मत समझो।
यह केवल
जीवन का वह अध्याय है
जिसने तुम्हें
मनुष्यों की सच्चाई सिखाई है।

और याद रखना—
हर बदल जाने वाला इंसान
प्रेम को गलत साबित नहीं करता।
कुछ लोग बस
प्रेम निभाना नहीं जानते।

Comments