मई की वर्षा और तुम्हारी प्रतीक्षा...

मई की वर्षा और तुम्हारी प्रतीक्षा

मई की दुपहरी थी,
धूप अंगारों सी तपती थी,
धरती की साँसों में जैसे
थकान की लंबी लहर बसती थी।

तभी अचानक
आकाश के कोमल कपोलों पर
श्यामल बादलों का काजल बिखर गया,
और पहली बूँद ने
सूखी मिट्टी के अधरों को चूम लिया।

वातावरण में उठी वह सौंधी गंध
मानो तुम्हारे केशों से झरती
चम्पा की मादक छाया हो,
और पवन की धीमी सरगम
तुम्हारी पायल की थिरकन बन गई।

मैं पगडंडी पर धीरे-धीरे बढ़ता हूँ,
भीगे आम्र-वृक्षों के नीचे,
जहाँ हर पत्ता
तुम्हारा नाम लिखता प्रतीत होता है।

मई की यह वर्षा
सावन से भी अधिक सुंदर लगती है,
क्योंकि इसमें
तुम्हारी प्रतीक्षा की तपिश घुली है।

उधर तुम्हारी आँखें
खिड़की के उस पार टिकी होंगी,
जहाँ से तुम
हर आती हुई आहट में
मेरे कदमों की ध्वनि खोजती होगी।

तुमने शायद
आज फिर वही गुलाबी साड़ी पहनी होगी,
जिसके आँचल पर
बारिश की बूँदें मोतियों सी ठहर जाती हैं।

तुम्हारे भीगे कपोलों पर
लाज की हल्की अरुणिमा होगी,
और अधरों पर
मेरा नाम सुनने की अधूरी प्यास।

मैं सोचता हूँ—
जब तुम्हारे समीप पहुँचूँगा,
तो यह वर्षा
और भी गहरी हो जाएगी,
बादल और झुक आएँगे,
और हवाएँ
हमारे प्रेम का गीत गाने लगेंगी।

तुम धीरे से कहोगी—
“इतनी देर क्यों लगा दी?”
और मैं मुस्कुराकर
तुम्हारी हथेलियों में
अपनी सारी यात्राएँ रख दूँगा।

फिर इस मई की वर्षा में
हम दोनों
एक ही छतरी के नीचे नहीं,
एक ही धड़कन के भीतर भीगेंगे।

धरती पर गिरती हर बूँद
श्रृंगार का श्लोक बन जाएगी,
और तुम्हारी आँखों में उतरकर
मेरा समस्त संसार
प्रेम से भर जाएगा।

उस क्षण
न ऋतु का भान रहेगा,
न समय का—
केवल तुम,
मैं,
और मई की वह अनंत वर्षा…॥

रूपेश रंजन

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