मैं कविता करता हूँ...
मैं कविता करता हूँ
ताकि भूल सकूँ अपने दर्द,
अगले पल में जा सकूँ,
पीछे सब कुछ है सर्द-सर्द...
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कहिए आप भी अपने मन की,
मैं भी दिल की बात कहता हूँ।
शब्दों में बाँट लें ये पीड़ा,
शायद कुछ दर्द कम होता हो।
चुप्पियों का बोझ बहुत भारी,
आँखों में अनकहा समंदर है,
तुम सुन लेना मेरी तन्हाई,
मैं तुम्हारे दुःख का हमसफ़र हूँ।
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तुम्हारे दर्द की तर्जुमानी
सिर्फ़ तुम्हारी ख़ामोशियाँ करती हैं,
दुनिया तो बस चेहरों को पढ़ती है,
रूह की दरारें कौन समझता है।
कोई ठहर कर सुन ले तुम्हें,
तो वह नेमत-ए-ख़ुदा लगता है,
और जो गिरते वक़्त
तुम्हारा हाथ थाम ले—
वही इंसान नहीं,
तुम्हारे लिए ईश्वर होता है।
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इंसान कितना भी बड़ा बन जाए,
शोहरत की बुलंदियों को छू ले,
मगर रूह के ज़ख़्मों को समझने के लिए
उसे एक अपना
ज़रूर चाहिए होता है।
क्योंकि तालीयाँ
दर्द नहीं समझतीं,
सिर्फ़ एक सच्चा दिल
आँखों की ख़ामोशी पढ़ पाता है।
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सब कुछ धीरे-धीरे
ख़त्म हो जाता है—
लोग, रिश्ते, उम्मीदें,
यहाँ तक कि मुस्कुराने की वजह भी।
मगर दर्द…
दर्द कभी ख़त्म नहीं होता,
वो बस
अपना ठिकाना बदल लेता है।
कभी यादों से निकलता है,
कभी अपनों की बेरुख़ी से,
और कभी
बिना किसी वजह के ही
दिल में उतर आता है।
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