धीरे-धीरे ठंडी पड़ती हुई मोहब्बत...

धीरे-धीरे ठंडी पड़ती हुई मोहब्बत... 


कभी तुम्हारी आवाज़

मेरे दिनों की धड़कन हुआ करती थी,

और तुम्हारी हँसी

मेरी उदासियों पर रखी

ईश्वर की कोमल हथेली जैसी लगती थी।


कभी ऐसा भी समय था

जब तुम्हारे “कैसे हो?” में

पूरा एक ब्रह्माण्ड बसता था,

और मेरे “ठीक हूँ” के पीछे छिपे दुःख को

तुम बिना कहे पढ़ लिया करती थीं।


मगर अब…

अब हमारे प्रेम में

वह गरमाहट नहीं रही

जो सर्द रातों को भी

बसंत बना दिया करती थी।


अब बातचीत होती है,

पर शब्दों में आत्मा नहीं होती,

हँसी सुनाई देती है,

पर उसमें अपनापन नहीं होता।


तुम अब भी वही हो,

मैं भी शायद वही हूँ,

पर हमारे बीच जो “हम” था,

वह जाने किस मोड़ पर

धीरे-धीरे दम तोड़ गया।


अब तुम्हारी आँखों में

मुझे अपना घर नहीं दिखता,

और मेरी चुप्पियों को

तुम अब कविता समझकर नहीं पढ़तीं।


कभी हम घंटों

एक-दूसरे की साँसों में खोए रहते थे,

आज कुछ मिनट साथ बैठना भी

एक औपचारिकता-सा लगता है।


कभी तुम्हारे हाथों की ऊष्मा

मेरे अस्तित्व को जीवित रखती थी,

आज वही स्पर्श

पतझड़ की सूखी डाल जैसा प्रतीत होता है।


शायद प्रेम अचानक नहीं मरता,

वह धीरे-धीरे ठंडा पड़ता है,

ठीक वैसे ही

जैसे चूल्हे की आग

राख बन जाने से पहले

धीरे-धीरे अपनी लपटें खो देती है।


हमने झगड़े कम किए,

पर दूरियाँ अधिक बढ़ा लीं,

हमने बातें बंद नहीं कीं,

बस भावनाएँ कहना छोड़ दिया।


अब तुम्हें खो देने का भय भी

पहले जैसा नहीं रहा,

और यही बात

मुझे भीतर तक डरा देती है।


क्योंकि प्रेम का अंत

अक्सर नफ़रत से नहीं होता,

बल्कि उस भयावह शांति से होता है

जहाँ दो लोग

एक-दूसरे के बिना भी

सामान्य दिखने लगते हैं।


कभी तुम मेरे नाम से मुस्कुराती थीं,

आज मेरे संदेश

तुम्हारे व्यस्त समय के कोनों में

अनदेखे पड़े रहते हैं।


और मैं…

मैं अब भी पुराने दिनों की राख में

कुछ अधजली गर्माहट खोजता रहता हूँ,

कि शायद कहीं

हमारा प्रेम अभी पूरी तरह मरा न हो।


शायद किसी शाम

फिर से तुम्हारी आँखों में

वही पुरानी चमक लौट आए,

शायद किसी बरसात में

हम फिर वैसे ही भीग जाएँ

जैसे पहली बार भीगे थे।


पर सच यह भी है

कि कुछ रिश्ते

समाप्त नहीं होते,

वे बस धीरे-धीरे

अपनी आत्मा खो देते हैं।


और फिर

दो लोग साथ रहते हुए भी

एक-दूसरे से बहुत दूर हो जाते हैं।

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