कभी-कभी प्रेम शब्दों में नहीं उतरता...
कभी-कभी
प्रेम शब्दों में नहीं उतरता,
वह बस
किसी अपने की मौजूदगी में
धीरे-धीरे साँस लेता है।
मन नहीं करता
हर बार तुम्हें
लंबी बातें सुनाने का,
न शिकायतें कहने का,
न अपने भीतर की
हर टूटन खोल देने का।
कभी बस इतना चाहा है—
कि तुम पास बैठो,
इतने पास
कि तुम्हारी ख़ामोशी की गरमाहट
मेरे भीतर उतर जाए।
हम दोनों
कुछ न कहें,
फिर भी
बहुत कुछ सुनाई देता रहे।
तुम्हारी साँसों की धीमी लय,
कलाई की हल्की हरकत,
आँखों में ठहरा हुआ अपनापन—
ये सब
किसी कविता से कम नहीं होतसब
दुनिया समझती है
प्रेम का अर्थ
लगातार बोलते रहना है,
पर सच्चा स्नेह तो
वह है
जहाँ चुप्पियाँ भी
अकेला महसूस नहीं होने देतीं।
मैंने कई लोगों के साथ
घंटों बातें की हैं,
फिर भी भीतर खाली रहा हूँ।
और तुम्हारे साथ
कुछ पल की ख़ामोशी ने
मुझे पूरा भर दिया।
तुम्हारे पास बैठकर
ऐसा लगता है
मानो समय थककर
धीरे से रुक गया हो।
जैसे जीवन की सारी भाग-दौड़
कुछ देर के लिए
मेरे कंधों से उतर गई हो।
तुम्हारे होने में
एक अजीब-सी शांति है,
जैसे तपते दिन में
बरगद की छाँव,
जैसे बिखरे मन पर
पहली बारिश की बूँदें।
कभी-कभी
मैं सिर्फ़ तुम्हें महसूस करना चाहता हूँ—
तुम्हारी उपस्थिति को,
तुम्हारे मौन को,
उस नर्म सुकून को
जो तुम्हारे आसपास
धीरे-धीरे खिलता रहता है।
और तब समझ आता है
कि प्रेम हमेशा
इज़हार नहीं माँगता,
कभी-कभी
सिर्फ़ एक साथ बैठना ही
पूरी दुनिया पा लेने जैसा होता है।
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