मैं नदी था, पहाड़ों की गोद से निकला...
मैं नदी था,
पहाड़ों की गोद से निकला
एक मासूम, चंचल,
निर्मल जलधारा की तरह।
पत्थरों से टकराता,
कल-कल गाता,
अपने छोटे से अस्तित्व में
पूरा आकाश समेटे चलता था।
थोड़ा सा दुःख होता,
तो लहरें काँप उठती थीं,
थोड़ा सा प्रेम मिलता,
तो किनारे महक उठते थे।
हर ऋतु का असर था मुझ पर,
हर स्पर्श मुझे बदल देता था।
मैं भावनाओं का एक छोटा संसार था।
फिर तुम आए…
धीरे-धीरे,
बिना शोर किए,
मेरे भीतर उतरते चले गए।
तुमने मुझे समझाया
कि गहराई क्या होती है,
कि हर बेचैनी को
शब्दों में कहना आवश्यक नहीं होता।
तुमने मेरे बहाव को
ठहराव का अर्थ दिया।
मैं नदी था,
तुमने समंदर बना दिया।
अब मुझमें
अनगिनत नदियाँ आकर मिलती हैं,
अनगिनत दर्द
अपना घर बना लेते हैं।
लोग अपने आँसू
मुझमें बहा देते हैं,
और मैं उन्हें
अपने भीतर चुपचाप समेट लेता हूँ।
पहले छोटी-सी चोट पर
तूफ़ान उठ जाया करता था,
अब पहाड़ टूटकर गिर पड़ें
तो भी मैं मौन रहता हूँ।
पहले प्रेम पाने की चाह थी,
अब प्रेम खोने का भय भी नहीं।
अब न कोई कष्ट मुझे तोड़ता है,
न कोई पीड़ा मुझे झुकाती है।
दुःख आते हैं,
कुछ देर ठहरते हैं,
और फिर
मेरी गहराइयों में खो जाते हैं।
तुमने मुझे इतना विशाल कर दिया
कि शिकायतें छोटी लगने लगीं।
अब मैं हर दर्द को
अपने भीतर जगह दे देता हूँ,
हर बिछड़न को
शांत लहरों में बदल देता हूँ।
लोग कहते हैं—
मैं बदल गया हूँ।
हाँ, बदल गया हूँ।
पहले मैं किनारों में बँधा था,
अब मेरे भीतर क्षितिज बसता है।
पहले मैं केवल बहता था,
अब मैं ठहरना भी जानता हूँ।
पहले मैं शब्दों में जीता था,
अब खामोशियों को समझता हूँ।
तुमने मुझे सिखाया
कि गहरा होने का अर्थ
कमज़ोर होना नहीं होता।
समंदर कभी चीखता नहीं,
फिर भी उसकी गहराइयों में
पूरा संसार डूब सकता है।
अब मैं शांतचित्त रहता हूँ—
धीर… गंभीर…
ऊपर से मौन,
भीतर से अथाह।
मेरी सतह पर
चाँद उतर आता है,
सितारे अपना प्रतिबिंब खोजते हैं,
और तूफ़ान भी
आकर थक जाते हैं।
कभी-कभी
रात के अंतिम पहर में
मैं स्वयं से पूछता हूँ—
क्या सचमुच मैं वही नदी हूँ
जो कभी पहाड़ों के बीच
मासूमियत से गुनगुनाती थी?
फिर तुम्हारी याद
एक लहर बनकर उठती है,
और मैं मुस्कुरा देता हूँ।
हाँ,
मैं वही नदी हूँ…
बस अब
तुम्हारे प्रेम ने मुझे
समंदर बना दिया है।
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