उसके हाथों की रोटियों में माँ जैसी ऊष्मा है...

उसके हाथों की झुर्रियों में
सिर्फ़ उम्र नहीं बसती,
वहाँ अनगिनत अधूरे सपनों की
मिट्टी भी जमती है।

वह जब सुबह-सुबह
हमारे आँगन में आती है,
तो लगता है जैसे
थकी हुई धूप
घर के कोनों में उतर आई हो।

उसकी साड़ी का फीका रंग
कई वर्षों की तपस्या कहता है,
उसकी आँखों के नीचे की कालिमा
रातों की अधूरी नींद का
मौन इतिहास लगती है।

वह बर्तन माँजती है,
झाड़ू लगाती है,
चूल्हे की राख झाड़ती है,
पर सच कहूँ—
वह केवल काम नहीं करती,
वह घर को जीवित रखती है।

माँ जब थक जाती हैं,
वह बिना कहे पानी रख देती है,
मेरे पिता की दवाइयों का समय
उसे घड़ी से पहले याद रहता है,
और मैं जब उदास बैठा होता हूँ,
तो पूछती है—
“बाबू, तबीयत ठीक है न?”

उस एक वाक्य में
इतनी आत्मीयता होती है
कि कई रिश्ते
उसके सामने छोटे लगते हैं।

धीरे-धीरे
वह हमारे घर की दीवारों में
बसती चली गई,
जैसे तुलसी की खुशबू
आँगन में बस जाती है।

पहले उसकी बहू आती थी,
फिर उसने स्वयं काम सँभाल लिया।
शायद बहू को
उसकी मेहनत का मूल्य नहीं दिखा,
शायद बेटे को
माँ के त्याग का अर्थ नहीं समझ आया।

कितना विचित्र है यह संसार—
जो स्त्री
अपने बच्चों के लिए
पूरी उम्र जलती रही,
उसी के हिस्से में
अंत में उपेक्षा आई।

उसकी बहू
उसकी आँखों में सम्मान नहीं रखती,
बेटा भी
जिम्मेदारियों की भीड़ में
माँ को कहीं पीछे छोड़ आया है।

पर वह फिर भी
हर सुबह उठती है,
अपने छोटे बेटे के लिए
रोटी बनाती है,
चावल धोती है,
सब्ज़ी काटती है,
और अपने टूटे हुए घुटनों के साथ
जीवन को ढोती रहती है।

उसने कभी शिकायत नहीं की।
बस कभी-कभी
बर्तन धोते समय
उसकी आँखें भीग जाती हैं,
और वह तुरंत
पल्लू से पोंछ लेती है—
जैसे दुख दिखाना भी
उसे अपराध लगता हो।

मैं कई बार सोचता हूँ—
समाज जिन हाथों को
“कामवाली” कहकर पुकारता है,
वही हाथ
कितने घरों की धड़कन होते हैं।

उनके बिना
सुबहें अधूरी हैं,
रसोई सूनी है,
घर बिखरा हुआ है,
और जीवन
अव्यवस्थित साँसों जैसा।

वह हमारे घर में
मजदूरी करने नहीं आती,
वह अपने स्नेह की
धीमी आँच पर
हमारे दिनों को पकाती है।

उसके हाथों की रोटियों में
माँ जैसी ऊष्मा है,
उसकी डाँट में अपनापन है,
उसकी चुप्पी में
असंख्य पीड़ाओं की राख दबी है।

मैंने देखा है—
जब वह थककर
दीवार से टिकती है,
तो उसकी साँसों में
पूरा जीवन काँपता है।

उसने शायद
अपने हिस्से की खुशियाँ
बहुत पहले त्याग दीं,
तभी तो अब
दूसरों के घरों में
मुस्कुराहटें सजाती फिरती है।

ऐसी स्त्रियाँ
धरती की तरह होती हैं—
सबका भार सहती हैं,
पर अपनी दरारें
किसी को नहीं दिखातीं।

उनकी ममता
रक्त के रिश्तों की मोहताज नहीं होती,
वह जहाँ अपनापन पाती हैं,
वहीं अपना हृदय रख देती हैं।

हमारे लिए भी
वह अब केवल
काम करने वाली स्त्री नहीं रहीं,
वह घर की आदत बन चुकी हैं,
एक ऐसी उपस्थिति
जिसके बिना
घर अधूरा लगता है।

ईश्वर करे,
उनकी झुर्रियों में
अब कुछ सुकून उतर आए,
उनकी थकी हथेलियों को
कुछ विश्राम मिले,
और जिन बच्चों के लिए
उन्होंने पूरी उम्र जलीं,
एक दिन वे भी समझें—
माँ केवल जन्म नहीं देती,
माँ अपना सम्पूर्ण जीवन
धीरे-धीरे संतानों में गलाती है।

और सच तो यह है—
कुछ स्त्रियाँ
रिश्तों से नहीं,
अपने त्याग से
माँ बन जाती हैं।


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