तुझसे बात करने के बाद हम
तुझसे बात करने के बाद हम,
तेरी की हुई बातों से बात करते हैं…
तू चला जाता है मगर
तेरे लफ़्ज़ देर तक कमरे में ठहरे रहते हैं।
जैसे किसी वीरान मकाँ में
अज़ान की आख़िरी सदा गूँजती रहती है,
वैसे ही तेरी आवाज़
मेरे भीतर उतरकर
रात भर मुझसे संवाद करती है।
तुझे शायद मालूम भी न हो—
कि तेरे जाने के बाद
मैं कितनी देर तक
तेरे “ख़याल रखना” को
अपने सीने से लगाए बैठा रहता हूँ।
तेरी हर छोटी बात
मेरे लिए किसी मुकम्मल किताब जैसी है,
जिसे मैं बार-बार पढ़ता हूँ,
हर बार नया अर्थ निकालता हूँ।
तूने जो हँसकर कहा था—
“इतना मत सोचा करो…”
मैं आज तक
उसी एक वाक्य के सहारे
हज़ार उदासियों से लड़ रहा हूँ।
तू जब बात करता है,
तो सिर्फ़ शब्द नहीं बोलता,
अपने होने की रौशनी भी छोड़ जाता है।
और फिर
तेरे चले जाने के बाद
मैं उसी रौशनी में बैठकर
तेरी कही हुई बातों से बातें करता हूँ।
कभी पूछता हूँ—
“क्या उसे भी मेरी याद आती होगी?”
कभी तेरे ही लफ़्ज़
मुझे तसल्ली देते हैं—
“हाँ… शायद आती होगी…”
कभी तेरी हँसी
मेरे कानों में लौट आती है,
और मैं अचानक
भीड़ के बीच मुस्कुरा उठता हूँ।
लोग समझते हैं
मैं पागल हूँ शायद,
उन्हें क्या मालूम
मैं किसी की याद के साथ जी रहा हूँ।
तुझसे हुई हर बातचीत
अब मेरे दिनों की पूँजी है,
तेरे हर जुमले को
मैंने दिल के किसी कोने में सँभाल रखा है।
जब रात बहुत भारी हो जाती है,
और तन्हाई
साँसों पर बोझ बनने लगती है,
तब मैं
तेरी पुरानी बातों का दरवाज़ा खोलता हूँ।
वहाँ तू अब भी मिलता है—
वैसा ही,
बेख़बर, मासूम,
मेरी धड़कनों में उतरता हुआ।
तूने शायद यूँ ही कहा होगा—
“खाना समय पर खा लिया करो…”
मगर मैं आज भी
तेरे उस ख़याल में
अपना पूरा प्रेम ढूँढ़ लेता हूँ।
मोहब्बत हमेशा
बड़े इज़हारों में नहीं होती,
कभी-कभी वो
छोटी-छोटी फ़िक्रों में छिपी रहती है।
तेरा पूछना—
“थक गए क्या?”
मेरे लिए
पूरी दुनिया की हमदर्दी जैसा था।
अब तू पास नहीं,
बातें भी कम हो गई हैं,
मगर तेरी कही हुई बातें
अब भी मेरा हाथ थामे चलती हैं।
मैं अक्सर
रात के सन्नाटों में
तेरे संदेश पढ़ता हूँ,
और हर शब्द को
अपने दिल पर धीरे-धीरे रखता हूँ।
कुछ लोग
ज़िंदगी में आकर चले जाते हैं,
मगर उनकी बातें
रूह में बस जाती हैं।
तू भी शायद
ऐसा ही कोई शख़्स है—
जिसकी मौजूदगी से ज़्यादा
जिसकी यादें मेरे साथ रहती हैं।
तुझसे बात करने के बाद हम,
तेरी की हुई बातों से बात करते हैं…
और यूँ ही
तेरी आवाज़ के सहारे
कई उदास रातें पार करते हैं।
कभी अगर
तुझे मेरी ख़ामोशी सुनाई दे,
तो समझ लेना—
मैं आज भी
तेरे किसी पुराने जुमले में
अपना घर ढूँढ़ रहा हूँ… ।
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