आज फिर कोई समझौता...

आज फिर कोई समझौता

मेरे हिस्से की धूप ले जाएगा,

और मैं मुस्कुराकर

अपने ही दर्द को संस्कार कह दूँगा।


आज फिर कोई कहेगा—

“तुम समझदार हो”,

और मैं अपनी इच्छाओं की चिताओं पर

सभ्यता के पुष्प चढ़ा दूँगा।


कितना विचित्र है न—

इस संसार में सबसे अधिक

उसी मनुष्य को परखा जाता है

जो सबसे कम शिकायत करता है।


जो मौन रहता है,

उसे पत्थर समझ लिया जाता है,

जबकि उसके भीतर

अनगिनत महासागर रो रहे होते हैं।


मैंने भी सीखा है

अपनी पीड़ाओं को

आँखों से नहीं,

शब्दों की तहों में छुपाना।


लोग कहते हैं—

“तुम बहुत परिपक्व हो”,

पर कोई यह नहीं पूछता

कि आखिर किस दुःख ने

इतनी जल्दी बड़ा कर दिया मुझे।


कभी-कभी मन चाहता है

कि मैं भी जिद करूँ,

किसी बच्चे की तरह रूठ जाऊँ,

किसी अपने के कंधे पर सिर रखकर

घंटों रोता रहूँ,

पर फिर वही आवाज़ आती है—

“तुम समझदार हो…”


और यह एक वाक्य

मेरे भीतर की हर कमजोरी का

गला घोंट देता है।


मैंने रिश्तों को बचाने के लिए

स्वयं को कितनी बार तोड़ा है,

यह हिसाब अब

मेरी आत्मा भी भूल चुकी है।


कभी अपने सपनों को छोड़ा,

कभी अपनी इच्छाओं को,

कभी अपने स्वाभिमान को,

तो कभी अपने हिस्से की खुशी को।


हर बार मैंने सोचा—

चलो, इस बार मैं झुक जाता हूँ,

शायद इससे प्रेम बच जाए।

पर प्रेम कहाँ बचता है?

वहाँ केवल आदतें बचती हैं,

औपचारिकताएँ बचती हैं,

और बच जाती है

एक थकी हुई आत्मा।


संध्या के इस शांत जल की तरह

मैं भी बाहर से स्थिर दिखता हूँ,

पर भीतर

डूबते सूरज का लाल दुःख लिए बैठा हूँ।


यह जो आसमान पर

धुँधले बादलों की चादर है,

कुछ वैसी ही परतें

मेरे हृदय पर भी चढ़ चुकी हैं।


मैंने लोगों को जाते देखा है,

बिना कारण,

बिना पछतावे,

बिना पीछे मुड़कर देखे।


और मैंने स्वयं को

हर बार वहीं खड़ा पाया—

हाथों में स्मृतियाँ लिए,

आँखों में प्रतीक्षा लिए।


कभी किसी ने मेरी खामोशी पढ़ी ही नहीं,

सबने केवल मेरे धैर्य की प्रशंसा की।


वे नहीं जानते

धैर्य भी एक प्रकार का युद्ध है,

जिसमें मनुष्य

प्रतिदिन स्वयं से लड़ता है।


रातें जब बहुत भारी हो जाती हैं,

तब मैं चाँद से बातें करता हूँ।

उसे बताता हूँ

कि मजबूत दिखने वाले लोग भी

भीतर से टूट जाया करते हैं।


कि हर मुस्कान के पीछे

एक युद्ध छिपा होता है,

और हर समझदार व्यक्ति

दरअसल बहुत थका हुआ इंसान होता है।


मैंने अब स्वीकार लिया है

कि इस दुनिया में

भावनाओं से अधिक

भूमिकाएँ निभाई जाती हैं।


कोई पुत्र बनकर जीता है,

कोई पिता बनकर,

कोई प्रेमी बनकर,

और कोई केवल

दूसरों की अपेक्षाओं का भार उठाते-उठाते

स्वयं से दूर हो जाता है।


शायद मैं भी

उन्हीं लोगों में से हूँ

जो सबको संभालते-संभालते

खुद बिखर जाते हैं।


पर फिर भी,

मेरे भीतर कहीं

एक छोटी-सी रोशनी अब भी जीवित है।


वह कहती है—

एक दिन ऐसा आएगा

जब तुम्हें समझदार नहीं,

समझा जाने वाला इंसान मिलेगा।


जब तुम्हारे मौन को

कोई भाषा की तरह पढ़ेगा,

जब तुम्हारे त्याग को

कर्तव्य नहीं, प्रेम कहा जाएगा।


जब कोई यह नहीं कहेगा—

“तुम तो संभाल लोगे”,

बल्कि वह तुम्हारा हाथ पकड़कर बोलेगा—

“अब तुम्हें अकेले नहीं संभलना पड़ेगा।”


उस दिन शायद

मेरे भीतर वर्षों से जमा

सारा नमक पिघल जाएगा,

और मेरी आँखों से

दुःख नहीं,

शांति बहेगी।


तब तक

मैं इस डूबते सूरज की तरह

हर दिन थोड़ा-थोड़ा बुझकर भी

आकाश को रंगता रहूँगा।


क्योंकि कुछ लोग

टूटकर भी

दूसरों के जीवन में

प्रकाश छोड़ जाते हैं।

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