हम किसी से प्रेम करते हैं...

हम किसी से प्रेम करते हैं,

धीरे-धीरे

अपनी पूरी आत्मा उसके हवाले कर देते हैं।

अपनी आदतें,

अपने सपने,

अपनी नींद,

अपनी मुस्कान—

सब कुछ।


फिर एक दिन

विवाह होता है।

शहनाइयाँ बजती हैं,

लोग आशीर्वाद देते हैं,

दो हाथ जुड़ते हैं,

दो परिवार मिलते हैं।


और हमें लगता है

अब जीवन पूर्ण हो गया।


लेकिन

समय के किसी मोड़ पर

अचानक पता चलता है—

जिसे हम प्रेम समझ बैठे थे,

वह शायद

केवल आकर्षण था,

समझौता था,

अकेलेपन का भय था,

या फिर

एक खूबसूरत अभिनय।


धीरे-धीरे

वह इंसान बदलने लगता है।


पहले जो

घंटों हमारी बातें सुनता था,

अब हमारे शब्दों से ऊबने लगता है।


पहले जो

हमारी आँखों में संसार खोजता था,

अब मोबाइल की स्क्रीन में खोया रहता है।


पहले जो

हमारी छोटी-सी उदासी पर बेचैन हो जाता था,

अब हमारे आँसुओं को

“नाटक” कहकर टाल देता है।


और तब

दिल के भीतर

एक अजीब-सी खामोशी जन्म लेती है।


वही इंसान

जिसके लिए हमने

अपनों से लड़ाई की,

अपने सपनों को बदला,

अपने अहंकार को मारा,

आज वही

हमारी आत्मा को सबसे अधिक चोट देता है।


विवाह के बाद

सिर्फ घर नहीं बदलते,

कई बार

लोगों के चेहरे भी बदल जाते हैं।


प्रेम के शब्द

धीरे-धीरे

कर्तव्यों की धूल में दब जाते हैं।


“कैसे हो?”

की जगह

“खाना बना?”

ले लेता है।


“तुम थक गई होगी…”

की जगह

“इतना भी क्या काम था?”

आ जाता है।


और फिर

एक दिन एहसास होता है—

हम किसी के साथ रह तो रहे हैं,

पर उसके भीतर

हमारे लिए प्रेम नहीं बचा।


सिर्फ रिश्ता बचा है।

सिर्फ सामाजिक बंधन।

सिर्फ साथ रहने की आदत।


कितना विचित्र है ना—

एक ही छत के नीचे

दो लोग रहते हैं,

पर उनके बीच

मीलों की दूरी होती है।


बिस्तर एक होता है,

लेकिन सपने अलग-अलग।


भोजन साथ होता है,

लेकिन मन अलग-अलग।


बातें होती हैं,

पर संवाद नहीं।


और सबसे अधिक पीड़ा तब होती है

जब इंसान यह समझ जाता है

कि वह अब

प्राथमिकता नहीं रहा।


जिसे वह

अपनी दुनिया मानता था,

उसके लिए

वह केवल एक सुविधा बन चुका है।


फिर भी

बहुत लोग

घर नहीं छोड़ते।


क्योंकि भारतीय समाज में

लोग टूटे हुए रिश्ते निभा लेते हैं,

पर टूटे हुए घर नहीं देख पाते।


वे मुस्कुराते हैं,

तस्वीरें डालते हैं,

त्योहार मनाते हैं,

मेहमानों के सामने

आदर्श दंपति बन जाते हैं।


लेकिन रात को

तकिए पर गिरते आँसू

सच्चाई बता देते हैं।


कई स्त्रियाँ

सिर्फ बच्चों के लिए जीती हैं।

कई पुरुष

सिर्फ जिम्मेदारियों के लिए।


प्रेम धीरे-धीरे

घर की दीवारों में कैद होकर

दम तोड़ देता है।


और तब

कोई अकेले बैठकर सोचता है—


“क्या यही वह प्रेम था

जिसके लिए मैंने

पूरा संसार छोड़ दिया था?”


पर शायद

सच्चा प्रेम

विवाह से पहले के वादों में नहीं,

विवाह के बाद के व्यवहार में छिपा होता है।


प्रेम केवल

“आई लव यू” कहना नहीं है।

प्रेम है—

थके होने पर भी

साथ बैठना।


क्रोधित होने पर भी

सम्मान बचाए रखना।


समय के साथ

एक-दूसरे को

और अधिक समझना।


प्रेम वह है

जहाँ विवाह के वर्षों बाद भी

कोई पूछे—

“तुम ठीक हो ना?”


और यदि यह प्रश्न

मर जाए,

तो समझ लेना चाहिए

कि रिश्ता जीवित है,

पर प्रेम मर चुका है।


फिर भी

इस संसार में

कुछ लोग ऐसे हैं

जो अंत तक प्रेम निभाते हैं।


जो समय के साथ

बदलते नहीं,

और यदि बदलते भी हैं

तो और अधिक गहरे हो जाते हैं।


काश,

हर विवाह को

ऐसा ही प्रेम मिले—

जहाँ इंसान नहीं बदलते,

केवल उम्र बदलती है।

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