गलत जगहों पर ठहर जाना आत्मा की सबसे धीमी मृत्यु होती है।
गलत जगहों पर ठहर जाना
आत्मा की सबसे धीमी मृत्यु होती है।
जहाँ सम्मान न हो,
वहाँ प्रेम भी
धीरे-धीरे अपमान में बदल जाता है।
इसलिए मैंने चुना—
भटकना।
हाँ, अनगिनत रास्तों पर
अकेले चलना चुना,
पर उस चौखट पर नहीं रुका
जहाँ मेरी ख़ामोशी तक
क़ैद कर दी जाती थी।
मैंने देखा है
कैसे कुछ लोग
रिश्तों के नाम पर
पिंजरे सजाते हैं,
और फिर उसे ही
घर कह देते हैं।
पर मैं कोई
दीवारों में साँस लेती तस्वीर नहीं था,
मैं तो वह हवा था
जिसे खुले आसमान की आदत थी।
मुझे मंज़ूर था
रेगिस्तानों की धूल में खो जाना,
पर किसी झूठे अपनत्व के
संगमरमर में दफ़्न होना नहीं।
भटकना हमेशा
भूल जाना नहीं होता,
कई बार
यह स्वयं को खोजने की
सबसे पवित्र यात्रा होती है।
मैं उन राहों पर चला
जहाँ कोई परिचित चेहरा नहीं था,
सिर्फ़ अपने भीतर की आवाज़ थी
जो बार-बार कहती थी—
“वापस मत लौटना
उस जगह
जहाँ तुम्हारी रूह घुटती थी।”
लोगों ने पूछा—
“कब तक यूँ अकेले फिरोगे?”
मैं मुस्कुरा दिया,
क्योंकि उन्हें कैसे समझाता
कि कुछ अकेलेपन
क़ैद से कहीं अधिक सुंदर होते हैं।
अब मैं
हर अनजान मोड़ को
एक नई संभावना की तरह देखता हूँ।
हर सफ़र में
थोड़ा और मुक्त हो जाता हूँ।
अगर जीवन का अर्थ
सिर्फ़ किसी छत के नीचे रहना होता,
तो परिंदे
आकाश से प्रेम न करते।
मैंने अपनी आत्मा को
बंधन से बाहर निकाल लिया है,
अब चाहे उम्र भर भटकना पड़े—
मैं भटकूँगा,
पर वहाँ कभी नहीं लौटूँगा
जहाँ मेरा अस्तित्व
धीरे-धीरे मर रहा था।
क्योंकि
गलत जगह पर कैद रहने से
उम्र भर भटकते रहना
वास्तव में अधिक सुंदर है।
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