बदलते समय की पुकार

बदलते समय की पुकार

समय की धारा बह रही है,
पर कुछ प्रश्न अब भी खड़े हैं,
क्यों बेटी के जन्म पे चेहरे,
अब भी चुपचाप पड़े हैं?

वो भी तो जीवन की कली है,
जिसमें खुशबू छुपी हुई,
फिर क्यों उसकी आहट से ही,
घर में चुप्पी छाई हुई?

उठो, बदलो इस सोच को,
जो जड़ बनकर बैठी है,
बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ,
यही सदी की सच्ची रीत है।

जब वो किताबों से सजेगी,
ज्ञान की ज्योति जलाएगी,
हर बंद दरवाज़े को तोड़कर,
नई दिशा दिखलाएगी।



अधूरी कहानी नहीं

वो कोई अधूरी कहानी नहीं,
वो पूरी किताब बन सकती है,
बस एक मौका दो उसको,
वो खुद इतिहास लिख सकती है।

उसकी आँखों में जो सपने हैं,
वो सीमाओं से परे हैं,
बस थोड़ी सी हिम्मत दो,
वो हर मुश्किल से लड़े हैं।

मत कहो उसे कमजोर कभी,
वो शक्ति का रूप भी है,
ममता की मूरत भी वही,
और संघर्ष का स्वरूप भी है।

जब वो पढ़ेगी, बढ़ेगी,
तो हर दिशा में रोशनी होगी,
बेटी की हर सफलता से,
नई सुबह की शुरुआत होगी।

Comments

Popular Posts