“आधी दुनिया, पूरा अधिकार”
“आधी दुनिया, पूरा अधिकार”
कहते हो—
“ये दुनिया हमारी है…”
पर ज़रा गिनो—
आधी दुनिया किसकी है?
आधी…
पर हक़—आधा भी नहीं?
क्यों?
जब खेत बोए जाते हैं—
तो हाथ उसके भी होते हैं,
जब घर सजाए जाते हैं—
तो रंग उसके भी होते हैं,
जब सपने बुने जाते हैं—
तो धागे उसके भी होते हैं…
फिर मंज़िल के दरवाज़े पर
नाम उसका क्यों नहीं होता?
वो जन्म लेती है—
तो आसमान आँखों में भर लेती है,
पर सिखा दिया जाता है—
“नज़र झुकी रखो…”
वो दौड़ना चाहती है—
पर कहा जाता है—
“कदम नाप कर रखो…”
वो बोलना चाहती है—
पर समझा दिया जाता है—
“चुप रहना ही बेहतर है…”
किसके लिए बेहतर?
उसके लिए—
या उस सोच के लिए
जो बदलने से डरती है?
वो डर नहीं है—
वो दरार है
जिससे रोशनी आएगी!
वो आवाज़ नहीं दबेगी—
वो गूँज बनेगी
जो दीवारें हिलाएगी!
पर उसे चाहिए—
सिर्फ एक चीज़…
मौका।
और मौका कहाँ से आता है?
मौका आता है—
जब उसके हाथों में
किताब आती है!
किताब—
जो उसे खुद से मिलाती है!
किताब—
जो उसे दुनिया दिखाती है!
किताब—
जो कहती है—
“तुम कम नहीं हो!”
जब वो पढ़ती है—
तो सिर्फ पास नहीं होती…
वो सीमाएँ पार करती है!
वो अंधेरों से निकलकर
उजालों की तरफ़ चलती है!
वो डॉक्टर बने—
तो ज़िंदगियाँ बचेंगी!
वो वकील बने—
तो इंसाफ़ सजेगा!
वो नेता बने—
तो नीतियाँ बदलेंगी!
पर…
ये सब सपने नहीं,
हक़ हैं उसके।
तो फिर क्यों—
आज भी कहीं
उसकी किताब छिन जाती है?
उसकी राह रोक दी जाती है?
क्यों?
बेटी बचाओ—
क्योंकि जीवन बराबर है!
बेटी पढ़ाओ—
क्योंकि भविष्य बेहतर है!
वो उठेगी—
तो सोच उठेगी!
वो बढ़ेगी—
तो देश बढ़ेगा!
सोचो…
एक सुबह—
जहाँ कोई फर्क न हो…
जहाँ हर बच्ची
खुलकर हँसे…
जहाँ हर सपना
बिना डर के पले…
वो सुबह आएगी!
ज़रूर आएगी!
पर—
उसका इंतज़ार मत करो!
उसे आज बनाओ!
अभी बनाओ!
यहीं बनाओ!
आधी दुनिया को
पूरा अधिकार दो…
क्योंकि—
जब आधी दुनिया आगे बढ़ती है,
तभी पूरी दुनिया आगे बढ़ती है।
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