हर सत्य सुंदर नहीं होता।
कदाचित् यही
मनुष्य जीवन का सबसे कठोर सत्य है—
हर सत्य
सुंदर नहीं होता।
कुछ सत्य
धीरे-धीरे
मन के भीतर उतरते हैं
और फिर
स्थायी पीड़ा बन जाते हैं।
जब इंसान यह स्वीकार कर लेता है
कि—
“हाँ, अब यही मेरी नियति है…”
तब उसके भीतर
एक अजीब-सी शांति जन्म लेती है।
वह शांति
सुख की नहीं होती,
थकान की होती है।
बहुत लड़ लेने के बाद,
बहुत समझा लेने के बाद,
बहुत रो लेने के बाद
जब कुछ नहीं बदलता,
तब मन
प्रतिरोध छोड़ देता है।
और फिर
इंसान जीना नहीं,
सिर्फ निभाना सीख जाता है।
सुबह उठना,
काम करना,
लोगों के बीच मुस्कुराना,
त्योहार मनाना—
सब चलता रहता है।
बस भीतर का प्रेम
धीरे-धीरे मौन हो जाता है।
कई लोग
जीवन भर
इसी मौन के साथ जीते हैं।
वे घर बनाते हैं,
बच्चों को बड़ा करते हैं,
जिम्मेदारियाँ निभाते हैं,
पर उनकी आत्मा में
एक कोना हमेशा खाली रहता है।
एक ऐसा कोना
जहाँ कभी
बहुत गहरा प्रेम रहता था।
और सबसे विचित्र बात यह है
कि समय के साथ
इंसान अपने दुख का भी अभ्यस्त हो जाता है।
जो पीड़ा
पहले आँसू बनकर बहती थी,
वही बाद में
स्वभाव बन जाती है।
फिर कोई पूछे—
“तुम ठीक हो?”
तो होंठ मुस्कुरा देते हैं,
भले भीतर
सब कुछ टूट चुका हो।
लेकिन सुनो—
नियति का अर्थ
सिर्फ दुख स्वीकार करना नहीं होता।
नियति का अर्थ यह भी है
कि इंसान
अपने टूटे हुए हिस्सों के साथ भी
जीवन को आगे बढ़ाना सीख ले।
हो सकता है
तुम्हें वह प्रेम न मिला हो
जिसकी तुमने कल्पना की थी,
पर इसका अर्थ यह नहीं
कि तुम्हारे भीतर का प्रेम व्यर्थ था।
सच्चे मन से प्रेम करना
कभी व्यर्थ नहीं जाता।
वह इंसान को
और अधिक गहरा,
और अधिक संवेदनशील बना देता है।
हाँ,
कुछ लोग
हमारी आत्मा को समझ नहीं पाते।
कुछ रिश्ते
सिर्फ नाम के रह जाते हैं।
कुछ सपने
विवाह की चौखट पर आकर टूट जाते हैं।
पर फिर भी
मनुष्य जीता है।
क्योंकि जीवन
सिर्फ प्राप्ति का नाम नहीं,
सहन करने की क्षमता का भी नाम है।
और कई बार
सबसे महान लोग वही होते हैं
जो भीतर से टूटे होने के बाद भी
दूसरों के लिए
छत बने रहते हैं।
शायद यही
तुम्हारे जीवन का सच हो।
लेकिन यह तुम्हारी सम्पूर्ण पहचान नहीं है।
तुम्हारे भीतर अब भी
एक संवेदनशील मनुष्य जीवित है—
जो प्रेम करना जानता है।
और इस कठोर संसार में
यह बहुत बड़ी बात है।
Comments
Post a Comment