बेटी: एक अनकहा उजाला....

बेटी: एक अनकहा उजाला


सुबह की पहली किरण जब
धीरे से धरती को छूती है,
वैसी ही कोमल आहट लेकर
एक बेटी जीवन में आती है।
न कोई शोर, न कोई दावा,
बस एक शांत सी उपस्थिति,
जैसे ईश्वर ने खुद लिखी हो
ममता और आशा की सृष्टि।

पर अफ़सोस, उसी क्षण अक्सर
खुशियाँ ठिठक सी जाती हैं,
कुछ आँखों में प्रश्न उभरते,
कुछ उम्मीदें थम सी जाती हैं।
क्यों आज भी जन्म उसका
एक उलझन बन जाता है?
क्यों उसके आने से ही
दिल का विश्वास डगमगाता है?

क्या वो जीवन का हिस्सा नहीं?
क्या उसकी धड़कन अलग है?
या फिर ये समाज ही
अब भी सोच में जकड़ा हुआ जाल है?
वो भी तो उसी मिट्टी की खुशबू है,
जिससे हर रिश्ता जन्म लेता है,
वो भी तो उसी सूरज की किरण है,
जो हर दिन नया रंग देता है।

फिर क्यों उसकी राह में
संकोच की दीवारें खड़ी कर दी जाती हैं?
क्यों उसके पंख उगने से पहले ही
उड़ानों की सीमाएँ गढ़ दी जाती हैं?
लेकिन सुनो —
वो रुकने वालों में से नहीं,
वो झुकने वालों में से नहीं,
वो हर बंधन को चुपचाप सहकर भी
टूटने वालों में से नहीं।

वो अपने भीतर एक समंदर लिए है,
जिसमें अनगिनत लहरें उठती हैं,
हर लहर एक सपना बनकर
क्षितिज से आगे बढ़ती है।
जब उसके हाथों में किताब आती है,
तो जैसे नियति मुस्कुराती है,
हर अक्षर उसके मन में
एक नई दिशा जगाती है।

वो पढ़ती है तो सोच बदलती है,
वो सोचती है तो राह बनाती है,
और जब वो राह बनाती है,
तो इतिहास खुद को दोहराता नहीं—बदल जाता है।
वो कल की चिकित्सक बन सकती है,
वो आज की वैज्ञानिक बन सकती है,
वो शब्दों में क्रांति लिख सकती है,
वो खामोशी में भी आवाज़ बन सकती है।

वो खेतों में अन्न उगा सकती है,
वो अंतरिक्ष में तारे गिन सकती है,
वो सीमाओं की रखवाली कर सकती है,
वो हर चुनौती को जीत सकती है।
पर ये सब तभी संभव है,
जब तुम उसके साथ खड़े रहोगे,
जब उसके हर छोटे कदम पर
तुम विश्वास के दीप जलाओगे।

बेटी बचाओ —
क्योंकि जीवन का हर रूप पवित्र है,
हर साँस में बसता हुआ
एक अनंत सृजन का चित्र है।
बेटी पढ़ाओ —
क्योंकि ज्ञान ही असली स्वतंत्रता है,
जो हर बंधन को तोड़कर
नई पहचान की क्षमता है।

ये कोई अभियान भर नहीं,
ये एक चेतना की लहर है,
जो हर दिल को छूकर
एक नई दिशा में बहती लहर है।
सोचो, जब हर बेटी निडर होगी,
जब हर बेटी शिक्षित होगी,
तब ये दुनिया सिर्फ जगह नहीं,
एक सुंदर विचार बन जाएगी।

जहाँ न कोई डर होगा,
न कोई ताना, न कोई दीवार,
जहाँ हर कदम पर साथ होगा,
और हर सपना होगा साकार।
वो खुद अपनी राह चुनेगी,
वो खुद अपनी पहचान लिखेगी,
वो किसी की परछाई नहीं,
वो अपनी ही रोशनी दिखेगी।

तो आओ, आज ये वादा करें—
ना कोई भेदभाव होगा,
हर बेटी को मिलेगा सम्मान,
हर घर में उसका मान होगा।
क्योंकि जब वो मुस्कुराएगी,
तो संसार मुस्कुराएगा,
जब वो आगे बढ़ेगी,
तो समय भी आगे जाएगा।

बेटी है तो संवेदना है,
बेटी है तो विस्तार है,
उसके बिना हर उपलब्धि
बस एक अधूरा आकार है।
इसलिए उठो, समझो, बदलो—
यही समय की पुकार है,
बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ,
यही भविष्य का सच्चा आधार है।

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