बहुत कठिन होता है...
बहुत कठिन होता है
उस संबंध को जीवित रखना,
जहाँ प्रेम से अधिक
असुरक्षा का निवास हो।
जहाँ समर्पण
धीरे-धीरे आत्मसम्मान को खा जाए,
और मनुष्य
अपने ही अस्तित्व से दूर होने लगे।
कुछ रिश्ते बाहर से
बहुत सुंदर दिखाई देते हैं,
पर भीतर
वे आत्मा को चुपचाप घायल करते रहते हैं।
वहाँ शब्द तो प्रेम के होते हैं,
पर व्यवहार में
स्वार्थ की कठोरता छिपी होती है।
आप अपना समय देते हैं,
अपनी संवेदनाएँ देते हैं,
अपनी निष्ठा,
अपनी प्रार्थनाएँ,
अपनी रातों की शांति तक दे देते हैं,
फिर भी
आप केवल एक “विकल्प” बने रहते हैं।
कितना विचित्र है न—
जिसे हम अपने हृदय का केंद्र मानते हैं,
वह कभी-कभी
हमें अपने जीवन के किनारों पर भी स्थान नहीं देता।
मैंने ऐसे लोगों को देखा है
जो प्रेम के नाम पर
दूसरों की भावनाओं से खेलते हैं।
वे जानते हैं
कि सामने वाला उन्हें सच्चे मन से चाहता है,
फिर भी
वे उसकी निष्ठा को
अपनी सुविधा का साधन बना लेते हैं।
जब मन हो
तो पास आ जाते हैं,
जब मन भर जाए
तो दूरी ओढ़ लेते हैं।
और सामने वाला व्यक्ति
हर बार यही सोचकर
स्वयं को समझा लेता है
कि शायद इस बार
सब ठीक हो जाएगा।
पर कुछ लोग
कभी बदलते नहीं।
वे केवल
आपकी सहनशीलता की सीमा बढ़ाते रहते हैं।
ऐसे संबंधों में
मनुष्य धीरे-धीरे
अपने ही भीतर खोने लगता है।
वह अपनी इच्छाएँ छोड़ देता है,
अपनी आवाज़ धीमी कर देता है,
अपने प्रश्नों को दबा देता है,
ताकि रिश्ता बचा रहे।
पर जो संबंध
आपकी आत्मा को ही तोड़ दे,
उसे बचाकर भी
आख़िर क्या बचता है?
प्रेम यदि आपको
हर दिन असुरक्षित करे,
हर रात रुलाए,
हर क्षण स्वयं पर संदेह करवाए—
तो वह प्रेम नहीं,
भावनात्मक बंधन है।
सच्चा प्रेम
कभी आपको छोटा महसूस नहीं कराता।
वह आपके अस्तित्व को
सम्मान देता है।
वह आपकी बात सुनता है,
आपकी चुप्पियों को समझता है,
आपके आँसुओं को
कमज़ोरी नहीं मानता।
जहाँ बार-बार
आपको स्वयं को सिद्ध करना पड़े,
वहाँ प्रेम नहीं,
स्वीकृति की भीख होती है।
और प्रेम
कभी भीख नहीं माँगता।
वह तो नदी की तरह बहता है—
स्वाभाविक,
निर्मल,
और निरंतर।
यदि कोई व्यक्ति
आपकी उपस्थिति को
केवल अपनी सुविधा के समय याद करे,
तो समझ लेना
कि आप उसके जीवन में
प्राथमिकता नहीं,
एक आदत मात्र हैं।
बहुत पीड़ा होती है
जब आप किसी को
अपना सम्पूर्ण हृदय दे दें,
और बदले में
वह आपको
अधूरा सम्मान भी न दे सके।
पर सबसे अधिक दुख
तब होता है
जब मनुष्य यह सब समझते हुए भी
उस संबंध को छोड़ नहीं पाता।
क्योंकि प्रेम
तर्क से नहीं चलता।
हृदय बार-बार
उसी व्यक्ति के पास लौटना चाहता है
जिसने उसे सबसे अधिक चोट दी हो।
शायद इसलिए
कई लोग वर्षों तक
अधूरे संबंधों में जीते रहते हैं।
वे बाहर से मुस्कुराते हैं,
पर भीतर
लगातार टूटते रहते हैं।
मैंने सीखा है
कि किसी को प्रेम करना गलत नहीं,
पर स्वयं को खो देना गलत है।
समर्पण सुंदर है,
पर इतना भी नहीं
कि आपकी पहचान मिट जाए।
रिश्ते में झुकना आवश्यक है,
पर हर बार केवल एक ही व्यक्ति झुके—
तो वह प्रेम नहीं,
अन्याय बन जाता है।
एक दिन
मनुष्य को यह स्वीकार करना पड़ता है
कि हर चाहा हुआ व्यक्ति
हमारा नहीं होता।
कुछ लोग
सिर्फ हमें यह सिखाने आते हैं
कि आत्मसम्मान के बिना
कोई भी प्रेम पूर्ण नहीं हो सकता।
और जब यह सत्य समझ आता है,
तब भीतर
एक नई दृढ़ता जन्म लेती है।
फिर मनुष्य
किसी के पीछे भागना छोड़ देता है।
वह स्वयं को चुनना सीखता है।
अपनी शांति को,
अपने स्वाभिमान को,
अपनी आत्मा की गरिमा को।
क्योंकि अंततः
सबसे आवश्यक प्रेम
वही है
जो मनुष्य स्वयं को देता है।
यदि कोई संबंध
आपकी आँखों की चमक छीन ले,
आपकी आत्मा को थका दे,
आपको हर दिन
अपने ही मूल्य पर संदेह करवाए—
तो उससे दूर हो जाना ही
सबसे पवित्र साहस है।
याद रखो—
आप खिलौना नहीं हो,
जिससे कोई
अपने अकेलेपन के क्षण भर खेल सके।
आप एक सम्पूर्ण मनुष्य हो,
जिसकी भावनाएँ
सम्मान की अधिकारी हैं।
और सच्चा प्रेम
कभी आपको
“विकल्प” नहीं बनाता,
वह आपको
अपने जीवन का सबसे सुंदर सत्य बना लेता है।
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