“बेटी: एक सवाल, एक जवाब, एक क्रांति”
“बेटी: एक सवाल, एक जवाब, एक क्रांति”
कहते हैं—
समय बदल रहा है...
समाज बदल रहा है...
सोच बदल रही है...
पर मैं पूछता हूँ—
क्या सच में सब बदल रहा है?
जब एक बेटी जन्म लेती है,
तो क्या हर घर में
उतनी ही खुशी गूंजती है
जितनी एक बेटे के जन्म पर?
या फिर आज भी
कुछ खामोशियाँ,
कुछ झुकी हुई नज़रें,
कुछ अधूरे से चेहरे
उसकी किलकारी को ढँक लेते हैं?
क्यों?
क्यों आज भी
उसके आने से पहले ही
उसकी सीमाएँ तय कर दी जाती हैं?
क्यों उसके सपनों से पहले
उसके डर गिन लिए जाते हैं?
वो भी तो वही धूप है
जो हर सुबह चमकती है...
वो भी तो वही बारिश है
जो हर सूखी मिट्टी को महकाती है...
फिर क्यों—
उसके हिस्से में
कम आसमान आता है?
सुनो समाज!
वो कमजोर नहीं है—
वो तो वो शक्ति है
जो जन्म देती है,
जो संभालती है,
जो बदल सकती है
पूरी दुनिया की परिभाषा!
वो बेटी है—
तो कल है!
वो बेटी है—
तो हल है!
वो बेटी है—
तो हर मुश्किल का सफल है!
बस…
उसे एक मौका चाहिए,
एक किताब चाहिए,
एक विश्वास चाहिए।
जब उसके हाथों में
किताब होती है—
तो वो सिर्फ पढ़ती नहीं…
वो समझती है,
वो सवाल करती है,
वो जवाब बनती है!
और जब एक बेटी सवाल बनती है—
तो समाज को जवाब देना पड़ता है!
वो डॉक्टर बनती है—
तो जीवन बचाती है!
वो वैज्ञानिक बनती है—
तो भविष्य गढ़ती है!
वो शिक्षक बनती है—
तो पीढ़ियाँ संवारती है!
वो नेता बनती है—
तो दिशा बदल देती है!
पर…
ये सब तब होगा—
जब हम उसे रोकेंगे नहीं…
जब हम उसे टोकेंगे नहीं…
जब हम उसकी उड़ान को
अपने डर से बाँधेंगे नहीं…
बेटी बचाओ—
क्योंकि हर जीवन अनमोल है!
बेटी पढ़ाओ—
क्योंकि शिक्षा ही असली मोल है!
बेटी पढ़ेगी—
तो देश बढ़ेगा!
बेटी बढ़ेगी—
तो समाज चढ़ेगा!
सोचो…
वो दिन कैसा होगा
जब कोई फर्क नहीं होगा
बेटे और बेटी में…
जब हर आँगन में
एक जैसी हँसी होगी…
जब हर सपने को
बराबर उड़ान मिलेगी…
वो दिन आएगा!
जरूर आएगा!
पर…
उस दिन का इंतज़ार मत करो—
उसे आज ही बनाओ!
आज…
अभी…
यहीं…
क्योंकि—
जब एक बेटी आगे बढ़ती है,
तो सिर्फ एक घर नहीं…
पूरा समाज आगे बढ़ता है…
और जब समाज आगे बढ़ता है—
तो इतिहास बदलता है…
तो उठो—
सोच बदलो…
दिशा बदलो…
बेटी बचाओ…
बेटी पढ़ाओ…
क्योंकि—
वो सिर्फ एक बेटी नहीं…
वो एक क्रांति है।
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