स्त्रियाँ और उनका लगातार टूटता भरोसा

स्त्रियाँ और उनका लगातार टूटता भरोसा

हर स्त्री
अपने जीवन में
किसी न किसी मोड़ पर
भरोसा खोती है।
कभी किसी व्यक्ति पर,
कभी किसी रिश्ते पर,
कभी समाज पर,
और कई बार
खुद अपने अस्तित्व पर भी।

यह भरोसा
एक दिन में नहीं टूटता।
यह धीरे-धीरे टूटता है—
बार-बार अपमानित होने से,
बार-बार चुप कराए जाने से,
बार-बार यह महसूस कराने से
कि उसकी सुरक्षा,
उसकी भावनाएँ,
उसकी स्वतंत्रता
इतनी महत्वपूर्ण नहीं हैं।

एक लड़की
जब छोटी होती है,
तो लोगों पर सहज विश्वास करती है।
उसे लगता है
कि दुनिया में अच्छाई अधिक होगी।
कि लोग उसकी हँसी की रक्षा करेंगे,
उसके सपनों को प्रोत्साहित करेंगे।
लेकिन जैसे-जैसे वह बड़ी होती है,
वह सीखती है
कि हर जगह सुरक्षित महसूस करना
उसके लिए संभव नहीं।

वह अपने कदम नापकर चलती है।
अपनी बात सोचकर कहती है।
अपनी तस्वीरें पोस्ट करने से पहले
हजार बार सोचती है।

क्योंकि उसे पता है
कि यह समाज
एक स्त्री को
बहुत जल्दी कठघरे में खड़ा कर देता है।
कितनी महिलाएँ
अपने ही दर्द को
हल्का बताने लगती हैं।

वे कहती हैं—
“कोई बात नहीं।”
“इतना तो चलता है।”
“मैं ठीक हूँ।”
जबकि भीतर
वे पूरी तरह ठीक नहीं होतीं।
यह भी हिंसा का प्रभाव है—
जब कोई इंसान
अपने घावों को सामान्य मानने लगे।
और सबसे दुखद यह है
कि कई बार
जो लोग उन्हें सबसे सुरक्षित महसूस कराने वाले थे,
वही उनकी चुप्पी का कारण बन जाते हैं।

कितनी स्त्रियाँ
घर के भीतर अपमान झेलती हैं,
रिश्तों में नियंत्रण सहती हैं,
और फिर भी
दुनिया के सामने मुस्कुराती रहती हैं।
क्योंकि समाज ने
उन्हें यह सिखाया है
कि टूटकर भी
सामान्य दिखना जरूरी है|

लेकिन कोई भी इंसान
लगातार टूटते भरोसे के साथ
पूर्ण जीवन नहीं जी सकता।
जब एक स्त्री
हर जगह सतर्क रहने लगे,
हर रिश्ते में डर खोजने लगे,
हर शब्द को तौलकर बोलने लगे—
तो समझ लेना चाहिए
कि समाज ने उसे सुरक्षित नहीं,
डरा हुआ बनाया है।

फिर भी—
वे प्रेम करती हैं।
वे रिश्तों पर विश्वास करने की कोशिश करती हैं।
वे अपने सपनों को जीवित रखती हैं।
यही उनकी सबसे बड़ी ताक़त है।
लेकिन अब
सिर्फ स्त्रियों की सहनशीलता की प्रशंसा पर्याप्त नहीं।

हमें ऐसा समाज बनाना होगा
जहाँ किसी स्त्री को
हर समय अपने बचाव में न जीना पड़े।
जहाँ उसकी “ना”
पूरे सम्मान के साथ सुनी जाए।
जहाँ उसकी स्वतंत्रता
चरित्र का प्रश्न न बने।

जहाँ उसे यह न लगे
कि दुनिया में सुरक्षित रहने के लिए
उसे खुद को छोटा करना पड़ेगा।
हमें लड़कों को
यह सिखाना होगा
कि प्रेम का अर्थ अधिकार नहीं,
विश्वास और सम्मान है।

और हमें स्त्रियों से कहना होगा—
तुम्हारा डर तुम्हारी कमजोरी नहीं।
यह उस समाज की विफलता है
जो तुम्हें निर्भय जीवन नहीं दे सका।
क्योंकि जिस दुनिया में
स्त्रियों का भरोसा लगातार टूटता रहे,
वहाँ सभ्यता केवल एक भ्रम बन जाती है।

और जिस दिन
हर स्त्री बिना भय के
लोगों और जीवन पर भरोसा कर सकेगी,
उसी दिन
मानवता सच में परिपक्व कहलाएगी।

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