इस संसार की हर देहरी पर...

इस संसार की हर देहरी पर

एक बंद दरवाज़ा रखा है,

जिसके पीछे

कोई अपना दुःख छुपाकर बैठा है।


कहीं कोई आँसूओं को

तकियों में सी रहा है,

तो कहीं कोई

मुस्कुराहटों के पीछे

अपनी टूटन छुपा रहा है।


दर्द यहाँ सबको है—

कोई लिख रहा है,

तो कोई पढ़ रहा है,

कोई गा रहा है,

तो कोई चुप रहकर

उसे जी रहा है।


यह जो पुराने दरवाज़ों पर

जंग लगे ताले दिखाई देते हैं,

असल में ये केवल लोहे के नहीं,

अनकहे जज़्बातों के ताले होते हैं।


हर मनुष्य के भीतर

एक बंद कमरा होता है,

जहाँ कुछ अधूरी इच्छाएँ,

कुछ बिछड़े लोग,

कुछ बुझी हुई उम्मीदें

अब भी साँस ले रही होती हैं।


कभी किसी माँ के मन में

बेटे की दूरी का दुःख पलता है,

कभी किसी पिता की आँखों में

असफलताओं की नमी तैरती है।


कहीं कोई प्रेम में हारकर

खुद को खो बैठा है,

तो कहीं कोई

अपनों के बीच रहकर भी

अकेला पड़ गया है।


दर्द केवल रोने का नाम नहीं होता,

कभी-कभी

बहुत शांत दिखने वाले लोग भी

सबसे अधिक घायल होते हैं।


वे हँसते हैं,

लोगों को संभालते हैं,

सलाह देते हैं,

पर रात की तन्हाइयों में

स्वयं बिखर जाते हैं।


इस दुनिया में

हर चेहरा एक कहानी है,

हर आँख एक नदी है,

और हर मौन

एक अधूरी कविता।


किसी के शब्दों में दर्द बसता है,

किसी की खामोशी में।


कई लोग

अपनी पीड़ाओं को

डायरी के पन्नों पर उतार देते हैं,

ताकि हृदय थोड़ा हल्का हो सके।


और कई लोग

उन्हीं पंक्तियों को पढ़कर

अपने घावों को पहचान लेते हैं।


यही तो जीवन का अद्भुत सत्य है—

हम सब

एक-दूसरे के दुःखों के यात्री हैं।


कोई किसी की कविता में

अपना बिछड़ना ढूँढ़ लेता है,

कोई किसी की आवाज़ में

अपना अकेलापन।


शायद इसी कारण

शब्द इतने पवित्र होते हैं।


वे टूटे हुए मनुष्यों को

जीने का साहस देते हैं,

और यह एहसास भी

कि वे अकेले नहीं हैं।


मैंने देखा है—

कुछ लोग दर्द से कठोर हो जाते हैं,

और कुछ

उसी दर्द से

बहुत सुंदर इंसान बन जाते हैं।


वे दूसरों की आँखों में

आँसू नहीं देख पाते,

क्योंकि वे स्वयं

अश्रुओं का भार जान चुके होते हैं।


पुराने मकानों की तरह

पुराने लोग भी

बहुत कुछ सहकर खड़े रहते हैं।


उनकी दीवारों पर

समय की दरारें होती हैं,

पर भीतर

अनुभवों का प्रकाश जलता रहता है।


यह संसार

पूर्ण सुख का स्थान कभी नहीं था,

यह तो भावनाओं का एक विशाल सागर है,

जहाँ हर आत्मा

अपनी-अपनी लहरों से लड़ रही है।


किसी के पास धन है

पर शांति नहीं,

किसी के पास प्रेम है

पर समय नहीं,

किसी के पास सपने हैं

पर अवसर नहीं।


फिर भी मनुष्य जीता है,

क्योंकि आशा

सबसे अंतिम साँस तक

मनुष्य का साथ नहीं छोड़ती।


जब सब कुछ टूट जाता है,

तब भी भीतर कहीं

एक छोटी-सी लौ जलती रहती है—

कि शायद कल बेहतर होगा।


और यही आशा

मनुष्य को

हर अँधेरे दरवाज़े के सामने

फिर से खड़ा कर देती है।


इसलिए यदि कभी

किसी की आँखों में थकान दिखे,

तो उसे कमजोर मत समझना।


हो सकता है

वह बहुत लंबे समय से

अपनी आत्मा के युद्ध लड़ रहा हो।


यदि कोई चुप हो,

तो उसकी चुप्पी का सम्मान करना,

क्योंकि कई बार

सबसे गहरे दुःख

शब्दों में नहीं उतर पाते।


और यदि कोई लिख रहा हो,

तो उसे लिखने देना,

क्योंकि कुछ लोग

स्याही से नहीं,

अपने हृदय से लिखते हैं।


दर्द यहाँ सचमुच सबको है—

कोई लिख रहा है,

तो कोई पढ़ रहा है,

और कोई

इन दोनों के बीच

अपनी जिंदगी समझ रहा है।

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