प्रेम पूर्णतः शब्दों में नहीं उतरता...

 

मैं हज़ारों किताबें लिख दूँ
प्रेम को समझाने के लिए,
शब्दों के समंदर भर दूँ
उसकी परिभाषा बताने के लिए।

मैं दर्शन रच दूँ,
कविताएँ अमर कर दूँ,
आकाश के तारों से भी
उसकी व्याख्या लिखवा दूँ—
फिर भी प्रेम
पूर्णतः शब्दों में नहीं उतरता।

क्योंकि प्रेम
किसी भाषा का विषय नहीं,
यह आत्मा का अनुभव है।

लेकिन—
मेरा तुम्हें यह कहना
कि “मैं तुमसे प्रेम करता हूँ,”
और तुम्हारा
उस सत्य को मुस्कुराकर स्वीकार कर लेना—
यह इस संसार की
सबसे अलौकिक घटनाओं में से एक है।

उस क्षण
मानो समय ठहर जाता है,
हवाएँ प्रार्थना बन जाती हैं,
और ब्रह्मांड
कुछ पल के लिए
अत्यंत सुंदर हो उठता है।

कितना अद्भुत है न—
अरबों मनुष्यों की भीड़ में
दो आत्माओं का
एक-दूसरे को पहचान लेना।

कितना रहस्यमयी है—
कि हृदय के भीतर छुपे
अनगिनत भय, संकोच और मौन के बाद भी
एक दिन कोई कह देता है—
“मैं तुमसे प्रेम करता हूँ।”

और उससे भी अधिक दिव्य यह है
कि सामने वाला उत्तर दे—
“मैं भी…”

उस क्षण
न कोई शास्त्र बड़ा लगता है,
न कोई साम्राज्य,
न कोई उपलब्धि।

क्योंकि उस छोटे-से स्वीकार में
पूरा ब्रह्मांड समाया होता है।

प्रेम का स्वीकार
केवल दो लोगों का मिलन नहीं,
यह दो अस्तित्वों का
एक-दूसरे में विश्वास करना है।

और शायद इसी कारण
यह घटना
जितनी बार भी घटे,
हर बार चमत्कार ही लगती है।

समय बदल जाएगा,
सभ्यताएँ मिट जाएँगी,
मनुष्य नए ग्रहों तक पहुँच जाएगा—
लेकिन किसी की आँखों में देखकर
धीरे से कहना—
“मैं तुमसे प्रेम करता हूँ,”
और बदले में
एक मौन स्वीकृति पा लेना—
यह अनुभूति
सदैव अलौकिक ही रहेगी।

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