क्या सचमुच किसी को दिल से याद करो तो उसकी रूह तक तुम्हारी आहट पहुँचती है?
क्या सचमुच
किसी को दिल से याद करो
तो उसकी रूह तक
तुम्हारी आहट पहुँचती है?
शायद पहुँचती होगी—
तभी तो
कुछ लोग बिना पुकारे भी
अचानक बेचैन हो उठते हैं,
जैसे किसी ने
उनके नाम पर
चुपके से दीप जला दिया हो।
मैंने कई रातें
तुम्हारी स्मृतियों के सहारे काटी हैं,
जहाँ नींद नहीं,
सिर्फ़ तुम्हारा नाम
तकिये पर बिखरा रहता था।
खिड़की से आती हवा
जब मेरे बालों को छूती,
मैं समझ लेता—
तुमने कहीं दूर बैठकर
मुझे याद किया है।
प्रेम का कोई डाकघर नहीं होता,
न कोई संदेशवाहक,
फिर भी
कुछ भावनाएँ
सीधे हृदय से निकलकर
दूसरे हृदय में उतर जाती हैं।
तुम्हारी याद
कभी बारिश की पहली बूँद-सी लगी,
तो कभी
सूखे वृक्ष पर लौटती हरियाली-सी।
मैंने तुम्हें
हर उस जगह महसूस किया
जहाँ तुम्हारा होना संभव भी नहीं था।
कभी मंदिर की घंटियों में,
कभी अज़ान की नरम सदा में,
कभी किसी अनजान बच्चे की मुस्कान में,
तो कभी
अपनी तन्हाई की दीवारों पर
उभरती तुम्हारी परछाईं में।
लोग कहते हैं—
यादें केवल मन का भ्रम होती हैं,
पर उन्हें क्या पता
कि कुछ रिश्ते
शब्दों से नहीं,
आत्माओं की निस्तब्ध भाषा से बनते हैं।
जब तुम अचानक
बिना कारण उदास हो जाते हो,
या भीड़ में रहकर भी
किसी की कमी चुभने लगती है,
समझ लेना—
कहीं कोई
पूरी शिद्दत से
तुम्हें अपने भीतर पुकार रहा है।
मैं आज भी
हर रात तुम्हारे नाम का
एक दीप जलाता हूँ,
कि शायद उसकी लौ
तुम्हारे अंधेरों तक पहुँचे
और तुम महसूस करो—
कोई है
जो तुम्हें
सिर्फ़ याद नहीं करता,
तुम्हें अपनी दुआओँ में जीता है।
और अगर सच में
दिल से की गई याद
दूसरे दिल तक पहुँचती है,
तो यक़ीन मानो—
तुमने भी कई बार
बिना वजह
मुझे महसूस किया होगा।
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