हम तुम कितना कुछ कर सकते थे प्रेम में…
हम तुम कितना कुछ कर सकते थे प्रेम में…
हम तुम कितना कुछ कर सकते थे प्रेम में,
सिर्फ़ हाथ थामने भर की देर थी,
और दुनिया की सारी दूरियाँ
हमारी साँसों के बीच सिमट सकती थीं।
हम तुम कितना कुछ कर सकते थे प्रेम में,
चाँद को अपनी छत बना लेते,
और सितारों को चादर की तरह ओढ़कर
रातों को अपनी कहानियाँ सुना देते।
हम तुम कितना कुछ कर सकते थे प्रेम में,
बारिश की हर बूँद में अपना नाम ढूँढ़ लेते,
भीगते हुए गलियों में
हँसी को अपना पता बना लेते।
हम तुम कितना कुछ कर सकते थे प्रेम में,
तेरे बालों में उँगलियाँ फेरते हुए
मैं अपनी सारी थकान भूल जाता,
और तू मेरी धड़कनों में
अपना घर बना लेती।
हम तुम कितना कुछ कर सकते थे प्रेम में,
खामोशियों को भी आवाज़ दे देते,
बिना बोले ही
एक-दूसरे को पूरी दुनिया कह देते।
हम तुम कितना कुछ कर सकते थे प्रेम में,
सफ़र छोटे होते या बड़े,
हर रास्ता मंज़िल बन जाता
अगर तू साथ होती।
हम तुम कितना कुछ कर सकते थे प्रेम में,
तेरी आँखों में जो सपने थे
उन्हें अपनी पलकों पर सजा लेता,
और हर टूटे हुए ख्वाब को
अपने दिल से जोड़ लेता।
हम तुम कितना कुछ कर सकते थे प्रेम में,
वक़्त को रोक लेते शायद,
या कम से कम
उसकी रफ़्तार को धीमा कर देते।
हम तुम कितना कुछ कर सकते थे प्रेम में,
झगड़ों को भी गीत बना लेते,
नाराज़गी को भी
इश्क़ की एक नई वजह बना देते।
हम तुम कितना कुछ कर सकते थे प्रेम में,
हर सुबह तेरे नाम की होती,
हर शाम तेरे साथ ढलती,
और हर रात
तेरी बाहों में सिमट जाती।
हम तुम कितना कुछ कर सकते थे प्रेम में,
पर शायद हम डर गए,
या हालातों ने
हमारे हाथों को अलग कर दिया।
अब बस यादें हैं,
जो अधूरी कहानियों की तरह
दिल में चुभती हैं,
और हर बार यही कहती हैं—
हम तुम कितना कुछ कर सकते थे प्रेम में,
अगर थोड़ा और हिम्मत होती,
अगर थोड़ा कम फ़ासला होता,
अगर थोड़ा ज़्यादा हम होते… 💔
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