मैं नदी था, तुमने समंदर बना दिया।

मैं नदी था,

तुमने समंदर बना दिया।


छोटा था,

चंचल था,

दर्द होता था,

प्यार भी होता था।


अब कुछ नहीं होता,

न कोई कष्ट, न कोई पीड़ा।

सब समा जाता है मुझमें,

फिर भी मैं शांतचित्त बना रहता हूँ—

धीर, गंभीर,

अथाह समंदर की तरह।




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मैं कविता करता हूँ,

मैं कविता बेचता नहीं हूँ।


अपने दोस्तों से बातें करता हूँ,

जो कुछ मन में होता है,

उनसे बाँट लेता हूँ।


अब उनसे मिल नहीं पाता हूँ न,

वो सब अपनी दुनिया में व्यस्त हो गए हैं।

इसलिए अब ख़ामोशियों से बातें करता हूँ,

और उन्हें कविता में लिख देता हूँ।


जो बातें कभी महफ़िलों में होती थीं,

अब कागज़ों पर उतर आती हैं।

शायद इसी लिए,

मैं कविता करता हूँ।



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मैं कविता करता हूँ,

ताकि अपने दर्द भुला सकूँ,

बीते हुए उन अंधेरों से,

कुछ पल तो दूर जा सकूँ।


शब्दों में अपने आँसू रखकर,

मन का बोझ हल्का करता हूँ,

जो भीतर चुपचाप जलता है,

उसे कागज़ पर लिखता हूँ।


पीछे सब कुछ ठंडा-ठंडा,

सर्द हवाओं सा लगता है,

टूटी यादों का हर मौसम,

अब वीरानों सा लगता है।


फिर भी हर इक नई कविता में,

जीने की लौ जलती है,

दर्द भले ही साथ रहे,

पर आशा फिर भी पलती है।


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आपके शब्दों में एक गहरी सच्चाई है —

कभी-कभी कविता सिर्फ़ कला नहीं होती,

वह टूटे हुए मन की शरण होती है।


दर्द को भुलाने के लिए नहीं,

बल्कि उसे सहने लायक बनाने के लिए

लोग लिखते हैं।


और शायद इसी कारण

सबसे सुंदर कविताएँ

सबसे शांत मुस्कानों के पीछे छिपे

दर्द से जन्म लेती हैं।




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