“घर नहीं आओगी, बेटी?”

“घर नहीं आओगी, बेटी?”

घर के आँगन में अब भी धूप उतरती है,
पर तेरे कदमों की आहट कहीं खो गई है,
वो तुलसी का चौरा आज भी तेरा नाम जपे,
पर तेरी हँसी जाने किस मोड़ पर सो गई है।

चौखट पर टिके हैं मेरी आँखों के दीप,
हर संध्या तेरा ही रास्ता तकते हैं,
थाली में परोसती हूँ तेरी पसंद की रोटी,
फिर चुपके से आँसू उसे भिगो देते हैं।

कभी तू दौड़ती थी चिड़िया-सी इस आँगन में,
तेरी चूड़ियों की खनक ही संगीत हुआ करती थी,
आज वही खामोशी मेरे सीने में चुभती है,
जैसे कोई अधूरी प्रार्थना रोती रहती हो।

तेरे बिना ये घर घर नहीं, बस एक साया है,
दीवारों पर तेरी परछाइयाँ ठहर जाती हैं,
तेरी गुड़िया, तेरी किताबें, तेरी अधूरी चिट्ठियाँ,
सब मुझसे तेरा हाल पूछती रह जाती हैं।

मैं हर रात चाँद से तेरा पता पूछती हूँ,
हर सुबह सूरज से तेरी खबर माँगती हूँ,
हवा के हर झोंके में तेरी खुशबू ढूँढती हूँ,
और हर साँस में तुझे पुकारती जाती हूँ।

बेटी, तू कहाँ है… किस हाल में है,
क्या तुझे मेरी याद कभी आती है?
क्या तेरी भी आँखें भीग जाती हैं कभी,
जब कोई “माँ” कहकर तुझे बुलाता है?

तेरे बिन रसोई की आग भी ठंडी लगती है,
तेरे बिन त्योहारों में रंग नहीं घुलते,
दीयों की रोशनी भी अधूरी लगती है,
जब तेरे चेहरे की चमक नहीं मिलती।

कभी तो आ जा… बस एक बार,
इस सूने आँगन को फिर से महका जा,
मेरे काँपते हाथों को थाम ले बेटी,
मेरी बुझती साँसों को फिर से जगा जा।

घर नहीं आओगी, बेटी?
या मेरी ये पुकार भी हवा में खो जाएगी?
मैं तो तेरी राह में उम्र बिता दूँगी,
पर क्या तेरी एक झलक भी नसीब न हो पाएगी?

मेरे हर दर्द का मरहम तू ही थी,
अब दर्द ही मेरा सहारा बन गया है,
तेरे बिना ये जीवन जैसे ठहर गया,
और समय भी जैसे मुझसे रूठ गया है।

बेटी… अगर सुन सके तो लौट आ,
मेरी आँखों की आखिरी आस बन जा,
इस माँ के सूने हृदय में फिर से,
अपनी मासूम हँसी की राग बन जा।

घर अब भी वही है…
दरवाज़ा अब भी खुला है…
बस तू नहीं है,
और तेरे बिना…
सब कुछ अधूरा है।

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