“वो पूछती नहीं—बदल देती है”...

“वो पूछती नहीं—बदल देती है”

मत पूछो उससे—
“तुम क्या बनोगी?”
वो चुप रहती है…
पर उसकी आँखें जवाब देती हैं—
“मैं वही बनूँगी…
जो तुमने कभी सोचा भी नहीं।”

वो जब जन्म लेती है,
तो सिर्फ एक बच्ची नहीं आती—
वो आती है
एक संभावना बनकर…
एक सवाल बनकर…
एक चुनौती बनकर…

चुनौती—
उन परंपराओं को,
जो उसे सीमाओं में बाँधना चाहती हैं…
चुनौती—
उन सोचों को,
जो उसे कम आँकना चाहती हैं…

पर वो पूछती नहीं…
वो बदल देती है!

वो गिरती है—
पर टूटती नहीं…
वो रुकती है—
पर झुकती नहीं…

वो चलती है—
तो रास्ते बनते हैं!
वो बोलती है—
तो सन्नाटे टूटते हैं!

पर सुनो…
ये सब अपने आप नहीं होता…
जब उसके हाथों में
किताब होती है—
तभी वो दुनिया को पढ़ पाती है…
तभी वो खुद को समझ पाती है…

किताब—
सिर्फ कागज़ नहीं!
किताब—
उसकी आज़ादी है!

हर अक्षर—एक हथियार!
हर शब्द—एक विचार!
हर पन्ना—एक द्वार!

और जब वो पढ़ती है—
तो डर हारता है!
अज्ञान हारता है!
भेदभाव हारता है!

और जीतती है—
एक बेटी!

पर क्यों…
आज भी कहीं-कहीं
उसकी किताब छिन जाती है?
क्यों उसके सपनों को
समझौते पहनाए जाते हैं?

क्यों?

क्या उसका सपना छोटा है?
या हमारी सोच छोटी है?

सुनो समाज!
वो दया नहीं माँगती…
वो अधिकार माँगती है!
वो सहानुभूति नहीं चाहती…
वो समानता चाहती है!

वो कहती नहीं—
कर के दिखाती है!
वो रुकती नहीं—
बढ़ती ही जाती है!

वो डॉक्टर बने—
तो जीवन बचाएगी!
वो पायलट बने—
तो आसमान सजाएगी!
वो सैनिक बने—
तो देश बचाएगी!

पर…
ये सब तभी होगा—
जब तुम उसका साथ दोगे…
जब तुम उसका हाथ थामोगे…

बेटी बचाओ—
क्योंकि हर जन्म एक अधिकार है!
बेटी पढ़ाओ—
क्योंकि शिक्षा ही असली हथियार है!
बेटी उठेगी—
तो सोच उठेगी!
बेटी बढ़ेगी—
तो देश बढ़ेगा!
कल्पना करो…
एक ऐसा समाज—
जहाँ कोई फर्क न हो…
जहाँ हर सपना बराबर हो…
जहाँ हर बेटी
बिना डर के हँसे…
बिना रोक के बढ़े…
वो दिन आएगा!
ज़रूर आएगा!
पर…
उस दिन का इंतज़ार मत करो—
उसे आज बनाओ!
अभी बनाओ!
यहीं बनाओ!
क्योंकि—
वो पूछती नहीं…
वो बदल देती है।

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