शून्य की खामोशी...

शून्य की खामोशी

शून्य ऐसा नहीं
कि वहाँ कुछ भी नहीं होता,
वहाँ तो बहुत कुछ होता है—
बस आवाज़ें मर जाती हैं,
और एहसास धीरे-धीरे
अपनी साँसें गिनने लगते हैं।

जब दर्द इतना गहरा हो
कि आँसू भी रास्ता भूल जाएँ,
जब दिल की धड़कनें
खुद से ही सवाल करने लगें,
तब इंसान रोता नहीं—
वो बस बैठ जाता है,
किसी कोने में,
और देखता रहता है शून्य को।

घड़ी चलती रहती है,
पर समय ठहर जाता है,
जैसे हर सेकंड
किसी अनदेखे बोझ से दबा हो,
जैसे हर पल
अपने ही भीतर गिर रहा हो।

कमरे की दीवारें
साथ तो देती हैं,
पर जवाब नहीं देतीं,
खिड़की से आती हवा
छूकर गुजरती है,
पर सुकून नहीं देती।

एक अजीब सी थकान
आँखों में उतर आती है,
नींद भी पास बैठती है,
पर अपनापन नहीं जताती,
सपने आते नहीं,
और यादें जाती नहीं।

तब इंसान सोचता है—
क्या यही है वो जगह
जहाँ दिल खुद को छोड़ देता है?

जहाँ उम्मीदें
धीरे-धीरे बुझ जाती हैं,
जैसे दीपक बिना हवा के
खुद ही हार मान ले।

पर शून्य में भी
एक हल्की सी रोशनी होती है,
बहुत दूर कहीं,
जो कहती है—
"यह अंत नहीं है,
बस एक ठहराव है।"

वो रोशनी धीमी होती है,
कमज़ोर होती है,
पर होती ज़रूर है,
जैसे किसी टूटी हुई उम्मीद का
आखिरी टुकड़ा।

और शायद—
यही टुकड़ा
किसी दिन फिर से
पूरी कहानी बन जाएगा,
किसी दिन ये खामोशी
गीत बन जाएगी,
किसी दिन ये शून्य
फिर से जीवन से भर जाएगा।

तब तक—
इंसान बैठा रहता है,
देखता रहता है,
और भीतर कहीं
चुपचाप जीता रहता है।

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