ज्ञान का अनुभव करना ईश्वरीय आनंद है...
ज्ञान का अनुभव करना ईश्वरीय आनंद है,
मानो मौन गगन में उतरता कोई दिव्य छंद है।
जब चेतना की धारा भीतर बहने लगती है,
तब आत्मा स्वयं अपने स्वर में कहने लगती है।
न पुस्तकों के अक्षर तब केवल शब्द रहते हैं,
वे तो प्राण बनकर अंतर्मन में बहते हैं।
हर पंक्ति में ब्रह्म का संगीत झंकृत होता है,
हर सत्य का दीप हृदय-आकाश में जलता है।
ज्ञान जब केवल जानकारी न रह जाए,
और मनुष्य स्वयं को स्वयं में ही पढ़ पाए,
तब भीतर का अंधकार पिघलने लगता है,
मिट्टी का यह तन भी चंदन-सा महकने लगता है।
विचारों की तपश्चर्या जब निर्मल हो जाती है,
आत्मा की हर पीड़ा फिर संबल हो जाती है।
तृष्णाओं के वन में जो भटका हुआ पथिक था,
ज्ञान उसे बताता है — वह स्वयं ही दीपक था।
यह अनुभव किसी मंदिर की सीमा में नहीं,
किसी ग्रंथ, किसी भाषा की गरिमा में नहीं।
यह तो उस क्षण जन्म लेता है भीतर,
जब मन झुकता है सत्य के चरणों पर निश्चल होकर।
ज्ञान वह गंगा है जो भीतर उतरती है,
और आत्मा की धूल को शांत कर गुजरती है।
उसके स्पर्श से अहंकार गलने लगता है,
मनुष्य फिर मनुष्य नहीं — चेतना बनने लगता है।
कितना अद्भुत होता है वह दिव्य आलोक,
जहाँ समाप्त हो जाते हैं संशय के शोक।
जहाँ प्रश्न भी प्रार्थना बन जाते हैं,
और उत्तर मौन में खिल जाते हैं।
ज्ञान का अनुभव कोई साधारण घटना नहीं,
यह ईश्वर की सबसे कोमल रचना से कम नहीं।
यह वह अमृत है जो समय से परे बहता है,
जिसे पीकर मनुष्य स्वयं में ही परमात्मा को कहता है।
जब बुद्धि विनम्र होकर हृदय से मिलती है,
तभी जीवन की वास्तविक ज्योति खिलती है।
और तब हर श्वास कह उठती है प्रेम से —
“ज्ञान ही ईश्वर है…
और उसका अनुभव ही परम आनंद है।”
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