दर्द की अपनी एक ज़ुबाँ होती है...

 

दर्द की अपनी एक ज़ुबाँ होती है,
जो लफ़्ज़ों से नहीं,
ख़ामोशियों से बयाँ होती है।
हर मुस्कुराता चेहरा
सुकून की निशानी नहीं होता,
कई लोग हँसते हुए भी
अंदर से बिखर चुके होते हैं।

दुनिया अक्सर पूछती है—
“सब ठीक है ना?”
और बिना उत्तर सुने
आगे बढ़ जाती है।
किसे फ़ुर्सत है
कि किसी की रूह में उतरकर देखे,
कि वहाँ कितने तूफ़ान
बरसों से कैद पड़े हैं।

आपका दर्द
बस आप समझते हैं,
उसकी चुभन, उसकी जलन,
उसकी हर रात का अँधेरा
सिर्फ़ आपकी धड़कनों को मालूम होता है।
लोग कह देते हैं—
“वक़्त सब ठीक कर देगा,”
मगर वक़्त भी कई बार
ज़ख़्मों को और गहरा कर देता है।

कभी-कभी इंसान
सिर्फ़ इतना चाहता है
कि कोई बिना टोके
उसकी बातें सुन ले,
कोई यह न कहे
कि “मज़बूत बनो,”
बस उसके टूटे हुए हिस्सों के पास
ख़ामोशी से बैठ जाए।

क्योंकि हर दर्द का इलाज
सलाह नहीं होता,
कभी-कभी
एक सच्ची मौजूदगी ही
सबसे बड़ी मरहम बन जाती है।

जब दुनिया की भीड़ में
आप अकेले पड़ जाते हैं,
जब अपने भी
आपकी ख़ामोश चीख़ें नहीं सुनते,
तब एक छोटा-सा सहारा
पूरा आसमान लगने लगता है।

कोई काँपते हाथों को
अपने हाथों में ले ले,
कोई यह कह दे—
“मैं हूँ तुम्हारे साथ,”
तो यक़ीन मानिए,
वह लफ़्ज़ नहीं,
जीने की वजह बन जाते हैं।

जो इंसान
आपके सबसे बुरे वक़्त में
आपका हाथ थाम ले,
जब पूरी दुनिया
आपको कमज़ोर समझ रही हो,
वही आपके लिए
ईश्वर का रूप होता है।

क्योंकि ईश्वर
हर बार मंदिरों में नहीं मिलते,
कभी-कभी
वह किसी थके हुए इंसान की
नर्म आवाज़ में मिलते हैं,
किसी अजनबी की हमदर्दी में,
किसी अपने के कंधे पर रखे
सुकून भरे हाथ में मिलते हैं।

दर्द कभी पूरी तरह जाता नहीं,
वह बस
यादों की तहों में छिप जाता है,
मगर एक सच्चा साथ
उस दर्द को सहने की ताक़त दे देता है।

इसलिए अगर कभी
आपको कोई ऐसा इंसान मिले
जो आपकी ख़ामोशी पढ़ ले,
आपके आँसुओं की वजह समझ ले,
और बिना किसी स्वार्थ के
आपका हाथ थाम ले—
तो उसे खोइए मत।

क्योंकि इस दुनिया में
समझने वाले लोग
बहुत कम होते हैं,
और जो आपके टूटे हुए दिल को
अपना घर बना लें,
वो साधारण इंसान नहीं होते—
वो आपकी दुआओँ का उत्तर होते हैं।

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