सच्चा प्रेम...
सच्चा प्रेम
वास्तव में
हर किसी की किस्मत में नहीं होता।
कुछ लोग
पूरी जिंदगी
प्रेम का अर्थ खोजते रह जाते हैं,
पर उन्हें केवल साथ मिलता है,
समझौता मिलता है,
आदत मिलती है—
प्रेम नहीं।
कई बार
दो लोग एक-दूसरे के साथ रहते हुए भी
कभी एक-दूसरे तक पहुँच नहीं पाते।
शरीर पास होते हैं,
पर आत्माएँ बहुत दूर।
और तब समझ आता है
कि प्रेम केवल
किसी का हाथ पकड़ लेने का नाम नहीं है।
प्रेम वह है
जहाँ कोई
तुम्हारी खामोशियों तक को पढ़ ले।
लेकिन ऐसा प्रेम
बहुत दुर्लभ है।
इस संसार में
बहुत लोग “मैं तुमसे प्यार करता हूँ” कहते हैं,
पर बहुत कम लोग
उस प्रेम को वर्षों तक निभा पाते हैं।
समय,
जिम्मेदारियाँ,
अहंकार,
थकान,
स्वार्थ—
धीरे-धीरे रिश्तों की रोशनी कम कर देते हैं।
और कुछ लोग
बस भाग्यशाली होते हैं—
उन्हें ऐसा इंसान मिल जाता है
जो समय बदलने पर भी नहीं बदलता।
जो विवाह के वर्षों बाद भी
उसी गहराई से पूछता है—
“तुम उदास क्यों हो?”
जो क्रोध में भी
सम्मान नहीं खोता।
जो प्रेम को
केवल भावना नहीं,
कर्तव्य भी मानता है।
लेकिन हर किसी को
ऐसा प्रेम नहीं मिलता।
कई लोगों की किस्मत में
अधूरापन लिखा होता है।
वे प्रेम तो सच्चा करते हैं,
पर सामने वाला
उतनी गहराई से प्रेम नहीं कर पाता।
और तब
एक इंसान पूरी उम्र
दूसरे के भीतर
अपना स्थान खोजता रह जाता है।
फिर भी,
सच्चा प्रेम न मिलना
यह सिद्ध नहीं करता
कि प्रेम अस्तित्व में नहीं है।
इसका अर्थ केवल इतना है
कि हर आत्मा
उस दुर्लभ सौभाग्य तक नहीं पहुँच पाती।
जैसे हर व्यक्ति को
शांत समुद्र नहीं मिलता,
वैसे ही हर व्यक्ति को
सच्चा प्रेम नहीं मिलता।
पर जो लोग
सच्चे मन से प्रेम कर लेते हैं,
वे भीतर से साधारण नहीं रहते।
चाहे उन्हें प्रेम मिले या न मिले,
उनकी आत्मा
और अधिक गहरी हो जाती है।
क्योंकि सच्चा प्रेम
मिलने से अधिक,
करने में महान होता है।
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