क्या कर रही हो...

 

क्या कर रही हो,
क्यूँ वक़्त बरबाद कर रही हो,
मेरी याद तुम्हें नहीं तड़पाती क्या,
तुम्हारा दिल नहीं करता
मेरे संग घंटों बातें करने का...

या सचमुच इतना बदल गया है सब,
कि अब मेरा नाम भी
तुम्हारी धड़कनों में नहीं उतरता?

मैं आज भी
रात के अंतिम पहर में
तुम्हारी आवाज़ की आहट खोजता हूँ,
मोबाइल की बुझी हुई स्क्रीन पर
अपनी उम्मीदें रख देता हूँ,
कि शायद तुम्हारा कोई संदेश
अँधेरे को चीरता हुआ आएगा,
और मैं फिर से जी उठूँगा।

पर तुम...
तुम शायद किसी और दुनिया में व्यस्त हो,
जहाँ मेरी यादों का प्रवेश वर्जित है,
जहाँ मेरी बेचैनियाँ
सिर्फ़ एक पुरानी कहानी बन चुकी हैं।

जानती हो?
मैंने तुम्हारे साथ बिताए हुए
हर एक क्षण को
अपने भीतर किसी इबादत की तरह सँजो रखा है।
तुम्हारी हँसी,
तुम्हारी झुँझलाहट,
तुम्हारे वो अधूरे वाक्य,
सब अब भी मेरे कमरे की दीवारों पर
गूँजते रहते हैं।

जब रात बहुत गहरी हो जाती है,
और शहर की आवाज़ें थककर सो जाती हैं,
तब तुम्हारी याद
धीरे-धीरे मेरे पास आ बैठती है।
वो पूछती है मुझसे—
“क्या अब भी इंतज़ार करते हो उसका?”

और मैं मुस्कुरा देता हूँ,
क्योंकि उत्तर तो
मेरी आँखों में पहले से लिखा होता है।

तुम्हें पता है,
कुछ लोग प्रेम करते नहीं,
प्रेम बन जाते हैं।
और तुम मेरे लिए
वैसी ही एक आदत बन चुकी हो,
जिसे छोड़ना
अपने अस्तित्व को छोड़ने जैसा है।

कितनी बार सोचा
कि अब तुम्हें याद नहीं करूँगा,
अब तुम्हारी राह नहीं देखूँगा,
अब अपने मन को समझा दूँगा
कि तुम लौटकर नहीं आओगी।

लेकिन हर बार
तुम्हारा नाम
मेरे भीतर किसी मंदिर की घंटी-सा बज उठता है,
और मैं फिर हार जाता हूँ।

तुम्हें घंटों बातें करने का दिल नहीं करता शायद,
पर मैं आज भी
तुम्हारे “कैसी हो?” में
पूरा दिन गुज़ार सकता हूँ।
तुम्हारे “सो जाओ अब” में
अपनी सारी थकान भूल सकता हूँ।

तुम नहीं जानती,
तुम्हारी चुप्पी भी
मुझसे कितनी बातें करती है।
वो हर दिन
मेरे सीने में उतरकर पूछती है—
“जिसे तुम इतना चाहते हो,
क्या वो तुम्हें उतना ही चाहता है?”

और मैं हर बार
इस प्रश्न से बच निकलता हूँ,
क्योंकि प्रेम में
सच्चाई से अधिक सुंदर
भ्रम होता है।

मैंने तुम्हारे लिए
अपने भीतर कितने मौसम बचाकर रखे थे—
बरसात की भीगी हुई शामें,
सर्दियों की धूप,
और गर्मियों की उनींदी दोपहरें।
सोचा था
तुम्हारे साथ बैठकर
इन सबको जिया जाएगा।

पर अब
ऋतुएँ आती हैं और चली जाती हैं,
और मैं
उसी जगह ठहरा रहता हूँ,
जहाँ तुमने आख़िरी बार कहा था—
“फिर बात करेंगे…”

वो “फिर”
आज तक नहीं आया।

कभी-कभी लगता है,
तुम्हें खोया नहीं हूँ मैंने,
बस तुम्हें पाने का अधिकार
समय ने मुझसे छीन लिया है।

फिर भी,
यदि किसी रात
तुम अचानक उदास हो जाओ,
यदि किसी भीड़ में
तुम्हें मेरी कमी महसूस हो,
यदि तुम्हारा दिल
एक बार फिर मेरा नाम पुकारे—

तो लौट आना।

मैं आज भी
उसी जगह खड़ा हूँ,
हाथों में अधूरी बातें लिए,
आँखों में अनगिनत प्रतीक्षाएँ लिए,
और दिल में
तुम्हारे लिए वैसा ही प्रेम लिए,
जैसा पहली बार था।

क्योंकि कुछ प्रेम
समाप्त नहीं होते,
वे बस
ख़ामोश हो जाते हैं।

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