“घर नहीं आओगी, बेटी…
“घर नहीं आओगी, बेटी…
बेटी, तेरे जाने के बाद
इस घर की साँसें जैसे आधी रह गई हैं,
तेरे कमरे की खिड़की अब भी खुलती है रोज,
पर तेरी हँसी कहीं दूर सिमट गई है।
अब तू किसी और आँगन की रौनक है,
किसी और घर की धड़कन बन गई है,
यह सोचकर दिल को समझा लेती हूँ मैं,
पर माँ का मन कहाँ समझ पाता है…
सुबह जब चूल्हा जलता है,
तेरी पसंद की खुशबू उठती है,
फिर याद आता है—अब तू यहाँ नहीं,
और मेरी आँखें चुपके से भीग जाती हैं।
तेरे बिन ये आँगन भी सूना लगता है,
जैसे सावन बिना बादल के हो,
तेरी पायल की वो मीठी धुन,
अब बस यादों में ही गूंजती हो।
तू जब विदा हुई थी उस दिन,
मैंने आँसू छुपाकर मुस्कुराया था,
सबने कहा—“अब वो पराई हो गई,”
पर मेरा दिल ये सच कब अपनाया था?
बेटी, तू पराई नहीं हो सकती,
माँ के दिल का हिस्सा कभी अलग नहीं होता,
रिश्तों के नाम बदल जाते हैं भले,
पर माँ-बेटी का रिश्ता कभी खत्म नहीं होता।
क्या तू कभी यूँ ही याद करती है मुझे?
क्या तेरी भी रातें मेरी तरह भीगती हैं?
क्या तू भी अपनी व्यस्त दुनिया में,
कभी मेरी खामोशी को सुनती है?
मैं जानती हूँ—अब तेरी जिम्मेदारियाँ हैं,
नए रिश्तों का तुझे निभाना है,
पर क्या उन सबके बीच कहीं,
मेरी ममता को भी थोड़ी-सी जगह मिल पाना है?
बस एक बार आ जा बेटी,
इस सूने घर को फिर से हँसा जा,
तेरी एक झलक को तरसती हैं आँखें,
अपने बचपन की खुशबू फिर से बसा जा।
घर नहीं आओगी, बेटी?
या अब ये हक भी छूट गया है?
क्या माँ का आँगन अब तेरे लिए,
बस एक पुरानी याद बन गया है?
मैं तो हर त्योहार तेरे नाम का दीप जलाती हूँ,
हर दुआ में तेरा सुख माँगती हूँ,
पर एक खालीपन है जो भरता नहीं,
मैं हर दिन तुझे याद करके जीती हूँ।
बेटी… जब भी थक जाए दुनिया से,
तो इस आँगन में लौट आना,
यहाँ आज भी तेरा ही हक है,
यहाँ तू फिर से “मेरी बच्ची” बन जाना।
दरवाज़ा अब भी खुला है,
राह अब भी तेरी देखती है,
माँ की ममता कहीं नहीं जाती—
बस चुपचाप तेरी प्रतीक्षा करती है…
घर नहीं आओगी, बेटी?
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