इंसान कितना भी बड़ा बन जाए...

 

इंसान कितना भी बड़ा बन जाए,
कितनी भी ऊँची बुलंदियों को छू ले,
दुनिया उसकी कामयाबी के क़िस्से लिखे,
उसके नाम पर तालियाँ बजें,
उसकी मौजूदगी से महफ़िलें रौशन हो जाएँ—
मगर दिल के किसी कोने में
एक खालीपन हमेशा रह जाता है।

क्योंकि इंसान
सिर्फ़ शोहरत से नहीं जीता,
वह जीता है
किसी अपने की हमदर्दी से,
किसी सच्चे एहसास से,
किसी ऐसे कंधे से
जहाँ वह अपने दर्द रख सके।

दुनिया अक्सर
आपकी कामयाबी देखती है,
मगर आपकी तन्हाइयाँ नहीं,
वो आपकी मुस्कान को सराहती है,
मगर उन रातों को नहीं जानती
जहाँ आप चुपचाप टूटते रहते हैं।

हर मज़बूत दिखने वाला इंसान
अंदर से मज़बूत नहीं होता,
कुछ लोग बस
अपनी तकलीफ़ों को छुपाने में माहिर हो जाते हैं।
वो लोगों के बीच हँसते हैं,
मगर अकेले में
अपनी ख़ामोशियों से हार जाते हैं।

और तब
उन्हें किसी ऐसे इंसान की ज़रूरत होती है
जो उनकी आवाज़ नहीं,
उनकी ख़ामोशी समझ सके।
जो यह न पूछे—
“तुम इतने उदास क्यों हो?”
बल्कि बिना पूछे
उनकी उदासी महसूस कर ले।

क्योंकि दर्द का रिश्ता
लफ़्ज़ों से नहीं होता,
वह तो रूह से जुड़ता है।
जिसे आप सचमुच अपना मानते हैं,
वही आपके चेहरे के पीछे छिपे
हज़ार आँसू पढ़ पाता है।

इंसान चाहे कितना भी बड़ा क्यों न बन जाए,
उसे एक ऐसा दिल चाहिए ही होता है
जहाँ वह बिना डर के टूट सके,
जहाँ उसे मज़बूत बनने का दिखावा न करना पड़े,
जहाँ उसकी कमज़ोरियाँ
उसके ख़िलाफ़ इस्तेमाल न हों।

क्योंकि इस दुनिया में
सब लोग साथ चल सकते हैं,
मगर बहुत कम लोग
आपके दर्द के साथ ठहरते हैं।

और जो ठहर जाए,
जो आपके सबसे बुरे वक़्त में भी
आपका हाथ न छोड़े,
जो आपकी चुप्पी में भी
आपकी चीख़ें सुन ले—
वही इंसान
आपकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी नेमत होता है।

क्योंकि आख़िर में
इंसान को दौलत नहीं याद रहती,
शोहरत नहीं याद रहती,
याद रहता है तो बस
वो एक इंसान
जिसने उसके टूटे हुए वक़्त में
उसे अकेला नहीं छोड़ा।

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