Rupesh Ranjan poems on social issues
1. बेरोज़गारी
डिग्रियों का बोझ लिए
कितने युवा
सड़कों पर भटकते हैं,
आँखों में सपने होते हैं,
पर जेबों में
अधूरी संभावनाएँ।
माँ की उम्मीदें
हर शाम दरवाज़े पर बैठी रहती हैं,
और पिता की खामोशी
घर की दीवारों में
धीरे-धीरे जमती जाती है।
यह सिर्फ़ नौकरी का संकट नहीं,
यह टूटते आत्मविश्वास का युग है।
2. अमीरी और गरीबी
एक शहर में
दो अलग-अलग संसार बसते हैं—
एक में
रातें संगीत से चमकती हैं,
दूसरे में
चूल्हा भी नहीं जलता।
किसी के लिए
भोजन स्वाद है,
किसी के लिए
जीवन।
सभ्यता की सबसे बड़ी विडंबना यही है
कि पृथ्वी सबको पाल सकती है,
पर मनुष्य का लालच
सबको जीने नहीं देता।
3. बुज़ुर्ग
जिन हाथों ने
हमारा बचपन सँवारा,
आज वही हाथ
सहारे की तलाश में काँपते हैं।
बुज़ुर्ग सिर्फ़ उम्र नहीं होते,
वे अनुभवों की जीवित पुस्तक होते हैं।
पर आधुनिकता की दौड़ में
लोगों ने
माता-पिता को
अक्सर अकेलापन दे दिया।
जिस घर में
बुज़ुर्गों की हँसी नहीं होती,
वहाँ समृद्धि भी अधूरी होती है।
4. बाल मजदूरी
छोटे हाथों में
खिलौने होने चाहिए थे,
पर वहाँ
ईंटों का बोझ था।
उन आँखों में
स्कूल के सपने होने चाहिए थे,
पर वहाँ
थकान का धुआँ था।
समाज तब तक शिक्षित नहीं कहलाएगा
जब तक हर बच्चा
किताबों से दोस्ती न कर ले।
5. दिखावा
आज लोग
दिल से कम,
प्रदर्शन से अधिक जीते हैं।
सोशल मीडिया की चमक में
असली मुस्कानें खो गई हैं।
हर कोई
सफल दिखना चाहता है,
पर भीतर से
कितने लोग टूटे हुए हैं,
यह कोई नहीं देखता।
सादगी में जो गरिमा है,
वह दिखावे के शोर में
कभी नहीं मिलती।
6. शहर और गाँव
शहरों में
इमारतें ऊँची हो गईं,
पर रिश्ते छोटे।
गाँवों में
सुविधाएँ कम थीं,
पर दिलों में अपनापन अधिक था।
अब गाँव
शहर बनने की कोशिश में हैं,
और शहर
मानवता खोने की।
प्रगति अच्छी है,
पर यदि मनुष्य ही खो जाए,
तो विकास अधूरा है।
7. जाति
मनुष्य जन्म से नहीं,
अपने कर्मों से महान होता है।
पर समाज ने
नामों और जातियों के बीच
इतनी ऊँची दीवारें बना दीं
कि इंसानियत
कहीं पीछे छूट गई।
जिस दिन
मनुष्य को सिर्फ़ मनुष्य समझा जाएगा,
उसी दिन
सभ्यता सचमुच विकसित होगी।
8. सत्य
झूठ आजकल
बहुत सुंदर कपड़े पहनता है,
और सत्य
अक्सर अकेला खड़ा रहता है।
लोग सुविधा के साथ खड़े होते हैं,
सच्चाई के साथ नहीं।
पर इतिहास गवाह है,
अंधकार चाहे जितना गहरा हो,
सूरज को उगने से
रोक नहीं सकता।
9. युद्ध
युद्ध में
कोई नहीं जीतता,
सिर्फ़ कब्रिस्तान बड़े हो जाते हैं।
राजनीति की महत्वाकांक्षाएँ
जब हथियार बनती हैं,
तो सबसे पहले
मासूम सपने मरते हैं।
धरती को
बारूद नहीं,
प्रेम की आवश्यकता है।
10. संवेदनहीनता
सब कुछ देखकर भी
चुप रह जाना
धीरे-धीरे आत्मा को पत्थर बना देता है।
आज लोग
दुर्घटनाएँ रिकॉर्ड करते हैं,
मदद कम करते हैं।
तकनीक बढ़ी है,
पर संवेदनाएँ सिकुड़ गई हैं।
यदि किसी अजनबी का दुःख
तुम्हें बेचैन कर दे,
तो समझना
तुम्हारे भीतर अभी भी
मनुष्य जीवित है।
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