Rupesh Ranjan small poems

1. भूख

शहर की चमकती सड़कों पर
मैंने भूख को नंगे पाँव चलते देखा है,
किसी होटल के पीछे
रोटी के टुकड़ों में
ज़िंदगी तलाशते देखा है।

एक तरफ़ उत्सव के दीप जले,
दूसरी ओर अँधेरी झोपड़ियों में
बच्चों को भूखे सोते देखा है।

सभ्यता की ऊँची इमारतों में
मानवता का पतन
बहुत गहराई से देखा है।




2. स्त्री

वह सिर्फ़ देह नहीं,
वह सृजन की प्रथम कविता है,
जिसकी आँखों में
सभ्यता का भविष्य पलता है।

पर अफ़सोस,
आज भी समाज
उसके चरित्र को
अपने संकीर्ण तराज़ू में तौलता है।

जिस दिन स्त्री
डर के बिना मुस्कुराएगी,
उसी दिन
यह समाज सचमुच सभ्य कहलाएगा।




3. शिक्षा

किताबें सिर्फ़ अक्षर नहीं होतीं,
वे अंधकार से प्रकाश तक की यात्रा हैं।

पर जब शिक्षा
व्यापार बन जाती है,
तब विद्यालयों में
चरित्र नहीं,
सिर्फ़ प्रतियोगिताएँ जन्म लेती हैं।

ज्ञान का उद्देश्य
मनुष्य को बड़ा बनाना था,
पर आज
डिग्रियाँ ऊँची हैं,
और सोच छोटी।



4. किसान

जिसने धरती को
अपने पसीने से सींचा,
उसी किसान के घर में
अक्सर भूख क्यों जन्म लेती है?

जिसके हाथों से
देश की थाली भरती है,
उसके सपनों में
इतनी वीरानी क्यों है?

धरती का सबसे धैर्यवान मनुष्य
आज भी
अपने हिस्से का सम्मान खोज रहा है।




5. राजनीति

कुर्सियों की लड़ाई में
सिद्धांत मरते देखे हैं,
वोटों के बाज़ार में
ईमान बिकते देखे हैं।

नेताओं के भाषणों में
विकास बहुत था,
पर गलियों में
अब भी टूटी उम्मीदें पड़ी थीं।

राजनीति सेवा होती
तो शायद
देश की आत्मा इतनी घायल न होती।




6. धर्म

धर्म का अर्थ
मनुष्य को मनुष्य से जोड़ना था,
पर लोगों ने
इसे दीवार बना दिया।

ईश्वर मंदिरों में कम,
भूखे की थाली में अधिक मिलता है।

जिस दिन इंसान
नफ़रत छोड़कर
प्रेम को पूजा बना लेगा,
उसी दिन
सच्चा धर्म जन्म लेगा।




7. युवा

युवाओं की आँखों में
क्रांति की आग है,
पर दिशाहीन समाज
उन्हें भ्रम में धकेल रहा है।

मोबाइल की चमक में
सपनों की रोशनी धुंधली हो रही है।

यदि युवा
अपने भीतर की शक्ति पहचान लें,
तो इतिहास
फिर से लिखा जा सकता है।




8. मजदूर

जो इमारतें खड़ी करता है,
उसके पास
अपना घर नहीं होता।

जो शहरों को सजाता है,
उसी के जीवन में
सबसे अधिक धूल होती है।

मज़दूर के हाथ
सिर्फ़ श्रम नहीं करते,
वे राष्ट्र की नींव लिखते हैं।



9. पर्यावरण

पेड़ों की कटती साँसों में
मैंने पृथ्वी को रोते देखा है।

नदियाँ अब
जल नहीं,
मनुष्य की स्वार्थपूर्ण सभ्यता का बोझ ढो रही हैं।

यदि प्रकृति नाराज़ हुई,
तो विज्ञान भी
मनुष्य को बचा नहीं पाएगा।

धरती को बचाना
अब विकल्प नहीं,
अस्तित्व की आवश्यकता है।




10. इंसानियत

आज लोग
धर्म, जाति, भाषा में बँटे हुए हैं,
पर मृत्यु के सामने
सब एक जैसे होते हैं।

इंसानियत की सबसे बड़ी हार
यह नहीं कि युद्ध हो रहे हैं,
बल्कि यह है कि
लोगों के दिलों में
करुणा कम हो रही है।

यदि किसी रोते हुए व्यक्ति को
तुम्हारे शब्द सुकून दे दें,
तो समझना
तुमने इस दुनिया को
थोड़ा बेहतर बना दिया।

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