प्रेम: प्रकृति की सबसे सरल रचना, जिसे मनुष्य ने सबसे जटिल बना दिया: By Rupesh Ranjan
प्रेम: प्रकृति की सबसे सरल रचना, जिसे मनुष्य ने सबसे जटिल बना दिया
प्रेम शायद इस संसार का सबसे सहज, सबसे स्वाभाविक और सबसे सुंदर अनुभव है। यह किसी विद्यालय में नहीं सिखाया जाता, किसी पुस्तक में पूरी तरह समझाया नहीं जा सकता, और न ही किसी नियमावली में बांधा जा सकता है। फिर भी विडंबना देखिए कि जिस प्रेम को प्रकृति ने सबसे सरल बनाया था, मनुष्य ने उसे सबसे जटिल बना दिया।
जब एक शिशु अपनी माँ की उंगली पकड़ता है, वहां प्रेम है। जब कोई पक्षी अपने बच्चों के लिए भोजन जुटाता है, वहां प्रेम है। जब कोई वृक्ष बिना किसी अपेक्षा के छाया देता है, वहां भी प्रेम है। प्रकृति के हर कोने में प्रेम अपनी सहजता और सरलता के साथ उपस्थित है। उसे किसी प्रमाणपत्र की आवश्यकता नहीं, किसी स्वीकृति की जरूरत नहीं, और किसी तर्क की अपेक्षा नहीं।
लेकिन मनुष्य ने प्रेम के चारों ओर इतने प्रश्न खड़े कर दिए कि उसकी मूल सुंदरता कहीं खोती चली गई। हमने प्रेम को शर्तों में बांटा, अपेक्षाओं में मापा, और अधिकारों में कैद कर दिया। हमने पूछा—"तुम मुझसे कितना प्रेम करते हो?" हमने कहा—"यदि तुम प्रेम करते हो तो ऐसा करो, वैसा करो।" धीरे-धीरे प्रेम एक अनुभव से अधिक एक परीक्षा बन गया।
सच्चा प्रेम तो बहती हुई नदी की तरह होता है। वह अपने अस्तित्व को सिद्ध करने की कोशिश नहीं करता। उसे अपने होने का प्रमाण नहीं देना पड़ता। वह बस बहता है, जीवन देता है, और अपने स्पर्श से हर चीज़ को सुंदर बना देता है। लेकिन जब हम उस नदी पर अधिकार, स्वार्थ और अपेक्षाओं के बांध बनाने लगते हैं, तब उसका स्वाभाविक प्रवाह रुक जाता है।
आज के समय में प्रेम को समझने से अधिक उसे परिभाषित करने की कोशिश की जाती है। लोग प्रेम को शब्दों में बांधना चाहते हैं, जबकि प्रेम का सौंदर्य उसकी अनकही उपस्थिति में है। वह आंखों की नमी में है, मौन की भाषा में है, प्रतीक्षा की धड़कनों में है, और त्याग की मुस्कान में है।
शायद प्रेम कभी जटिल था ही नहीं। जटिल तो हमारा मन है, जो हर सरल चीज़ को अपने विचारों, भय, अपेक्षाओं और असुरक्षाओं से उलझा देता है। प्रेम तो आज भी उतना ही सरल है जितना हजारों वर्ष पहले था। सूर्योदय की पहली किरण जितना सरल, बारिश की पहली बूंद जितना निर्मल, और किसी बच्चे की मुस्कान जितना निष्कपट।
यदि प्रेम को फिर से पाना है, तो शायद हमें उसे समझने की नहीं, महसूस करने की आवश्यकता है। हमें उसे नियंत्रित करने की नहीं, स्वीकार करने की आवश्यकता है। हमें उसे साबित करने की नहीं, जीने की आवश्यकता है।
अंततः, संसार की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि प्रेम—जो प्रकृति की सबसे सरल भाषा था—मनुष्य के हाथों सबसे जटिल व्याख्या बन गया। और शायद जीवन की सबसे बड़ी बुद्धिमत्ता इसी में है कि हम प्रेम को फिर से उसकी मूल सरलता में खोज लें।
"प्रेम कभी कठिन नहीं था; हमने उसे कठिन बना दिया।
प्रकृति ने उसे हृदय में रखा था, हमने उसे दिमाग की भूलभुलैया में खो दिया।" ❤️🌿
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