सब कुछ वैसा ही प्रतीत हुआ...
वो बातों में अपनापन था,
हर लफ़्ज़ में कोई संकेत था,
महसूस होता था मानो उसके मन में
मेरे लिए प्रेम का कोई गीत था।
सब कुछ वैसा ही प्रतीत हुआ,
जैसा हृदय ने समझा और माना था,
उम्मीद थी कि समय के साथ
वो प्रेम की राह पर आगे बढ़ेगी।
पर कल की बातचीत ने
कुछ धारणाएँ बदल दी हैं,
अब लगता है भावनाओं की नदी में
अनगिनत अनकही हलचलें हैं।
शायद जो दिखता था, वो पूरा सत्य नहीं,
शायद कुछ परतें अब भी अनजानी हैं,
उसके व्यक्तित्व के आईने में
कई तस्वीरें धुंधली और पुरानी हैं।
वो उन चरित्रों में से है शायद,
जिन्हें शब्दों से नहीं आँका जाता,
जिनके मन का मौसम हर पल बदले,
जिनका अनुमान कभी लगाया नहीं जाता।
अब मैं ठहरा हूँ एक मोड़ पर,
जहाँ विश्वास और संशय साथ खड़े हैं,
प्रेम है या केवल भ्रम का जाल,
ये प्रश्न अभी भी मन में पड़े हैं।
Comments
Post a Comment