बेहतर है तू अलग है....

 तुम कहते हो —

"बेहतर है तू अलग है,

प्यार नहीं तो साथ ही क्यों रहना..."


तो सुनो —


जब दिलों में अपनापन मर जाए,

रिश्तों का हर रंग बिखर जाए,

जब बातें सिर्फ़ औपचारिक हों,

और खामोशियाँ ही संवाद बन जाएँ,


तब सचमुच बेहतर है अलग होना,

बनावटी मुस्कानों में क्यों खोना।


प्यार अगर एहसास न रहे,

सिर्फ़ एक मजबूरी का वास न रहे,

तो फिर एक ही छत के नीचे,

अजनबियों-सा जीवन क्यों जीना?


बेहतर है राहें जुदा कर लेना,

टूटे सपनों को हवा कर देना।


क्योंकि प्रेम बंधन नहीं,

मन का स्वच्छंद समर्पण है,

जहाँ सम्मान और स्नेह न बचे,

वहाँ साथ रहना भी एक दंड है।


इसलिए अगर प्यार नहीं रहा,

तो विदा का साहस रखना,

झूठे रिश्तों की कैद से बेहतर,

सच की तन्हाई में जीना।


बेहतर है तू अलग है,

प्यार नहीं तो साथ ही क्यों रहना।

दिल से दिल का नाता टूट जाए,

तो फिर नाम भर का रिश्ता क्यों रखना।


Rupesh Ranjan

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