कर्ण का मौन...
कर्ण का मौन
द्रौपदी का वह अट्टहास, जो सभाओं में गूँजा था, जिसने एक वीर के हृदय पर अपमान का तीर छोड़ा था, वह भी कर्ण को उतना नहीं चुभा, जितना भाग्य का अन्याय चुभता था।
क्योंकि उसके जीवन की धधकती अग्नि में ऐसे हजारों उपहास जल चुके थे, उसके घाव इतने गहरे थे कि शब्दों के शूल भी उनकी गहराई तक पहुँच न पाते थे।
वह जन्म से ही प्रश्न था, जिसका उत्तर किसी के पास नहीं था। वह सूर्य का पुत्र था, पर संसार ने उसे सूतपुत्र कहकर पुकारा।
जिसे माँ की गोद न मिली, जिसे कुल का सम्मान न मिला, जिसे अपनी पहचान के लिए हर श्वास के साथ युद्ध करना पड़ा, उसके लिए एक सभा का उपहास किसी आँधी में उड़ते तिनके समान था।
कर्ण जानता था— सबसे बड़ी पीड़ा लोगों की हँसी नहीं होती, सबसे बड़ी पीड़ा होती है अपनी योग्यता सिद्ध करने के बाद भी स्वीकृति न मिलना।
उसने धनुष उठाया, तो वंश पूछा गया। उसने पराक्रम दिखाया, तो जन्म पूछा गया। उसने दान दिया, तो कुल पूछा गया।
हर बार उसकी प्रतिभा से पहले उसकी पहचान का न्याय हुआ।
फिर भी वह टूटा नहीं।
वह उस पर्वत की तरह खड़ा रहा जिस पर युगों की वर्षा होती है, पर जो अपनी ऊँचाई नहीं खोता।
उसने सीखा था— भाग्य यदि द्वार बंद करे, तो परिश्रम से दीवारों में मार्ग बनाना चाहिए।
जब संसार ने उसे तिरस्कृत किया, तब उसने अपनी करुणा को नहीं छोड़ा। जब उसे सम्मान नहीं मिला, तब भी उसने सम्मान देना नहीं छोड़ा।
यही कर्ण की महानता थी।
उसकी आँखों में आँसू थे, पर होंठों पर शिकायत नहीं थी। उसके हृदय में तूफान थे, पर मुख पर धैर्य था।
वह जानता था— रोने से इतिहास नहीं बनता, संघर्ष से बनता है।
कर्ण की पीड़ा केवल उसकी नहीं थी, वह उन सबकी पीड़ा थी जिन्हें योग्य होने पर भी अवसर नहीं मिला, जिन्हें मेहनत के बाद भी सम्मान नहीं मिला, जिन्हें अपने ही सपनों के लिए बार-बार लड़ना पड़ा।
उसका जीवन कहता है—
यदि तुम्हें ठुकराया गया है, तो स्वयं को कम मत समझो।
यदि लोग तुम्हारे नाम, तुम्हारे परिवार, तुम्हारी परिस्थितियों का उपहास करें, तो याद रखना— सूर्य कभी अपनी चमक दूसरों की स्वीकृति से नहीं पाता।
कर्ण की तरह चलो।
घाव हों तो भी चलो, अकेले हो तो भी चलो, हार सामने दिखे तो भी चलो।
क्योंकि विजेता वही नहीं होता जो युद्ध जीत जाए, विजेता वह भी होता है जो अन्याय के बीच अपनी गरिमा बचाए रखे।
एक दिन समय स्वयं गवाही देता है।
अट्टहास करने वालों के नाम धूल में खो जाते हैं, पर पीड़ा को शक्ति में बदलने वालों की कथा युगों तक सुनाई जाती है।
कर्ण आज भी अमर है, क्योंकि उसने हमें सिखाया—
"जीवन का सबसे बड़ा उत्तर प्रतिशोध नहीं, बल्कि अपने संघर्ष को इतना महान बना देना है कि अपमान स्वयं छोटा पड़ जाए।"
और सच यही है—
जिस मनुष्य के भीतर कर्ण जैसी अग्नि जलती हो, उसे किसी के उपहास से नहीं, केवल अपने अधूरे साहस से डरना चाहिए।
इसलिए उठो, अपने घावों को छिपाओ मत, उन्हें अपनी शक्ति बना लो।
क्योंकि इतिहास में वही अमर होते हैं जो दर्द से टूटते नहीं, दर्द को ही अपना प्रकाश बना लेते हैं।
रूपेश रंजन
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