रूह-ए-करार बे-मोहब्बती क्या समझेंगे...

रूह-ए-करार बे-मोहब्बती क्या समझेंगे,

रूह पिघल जाती है महबूब के दीदार से।


रूपेश रंजन... 


---------

रूह-ए-करार बे-मोहब्बती क्या समझेंगे,

रूह पिघल जाती है महबूब के दीदार से।


मन में बरसात उतर आती है,

और दिल को सुकून मिलता है,

बस एक मुस्कान,

एक नज़र,

और उस प्यारे से इज़हार से।


रूपेश रंजन... 


Comments

Popular Posts