दर्द की उस सीमा पर...
दर्द की उस सीमा पर...
मेरा दर्द इतना गहरा है भीतर,
कि लोगों की बातें अब चुभती नहीं हैं।
जिन शब्दों से कभी आत्मा काँप जाती थी,
वे आज मेरे कानों तक पहुँचती नहीं हैं।
मैं इतना कुछ सह चुका हूँ जीवन में,
कि अपमान भी अब साधारण लगता है।
जो आँधियाँ किसी को तोड़ देती हैं,
मुझे उनका हर प्रहार परिचित लगता है।
रातों ने मेरी आँखों से नींद छीनी,
सपनों को बिखरते हुए देखा है मैंने।
अपनों के बदलते हुए चेहरे,
और विश्वास को मरते हुए देखा है मैंने।
कई बार किस्मत ने मुझे
पत्थरों की राह पर नंगे पाँव चलाया है।
हर मोड़ पर संघर्ष का दरिया देकर,
मुझे खुद से ही लड़ना सिखाया है।
लोग सोचते हैं मैं खामोश हूँ,
शायद इसलिए कि मेरे पास जवाब नहीं।
पर सच तो यह है कि मेरे भीतर
अब किसी शिकायत का हिसाब नहीं।
जो व्यक्ति अपने आँसुओं को
अंधेरी रातों में पीना सीख जाता है,
वह दुनिया की कठोरता से नहीं डरता,
वह हर तूफान में जीना सीख जाता है।
मैंने देखा है उम्मीदों का टूटना,
और फिर उन्हीं टुकड़ों से दीप जलाना।
मैंने सीखा है गिरकर उठना,
और राख से अपना अस्तित्व बनाना।
अब यदि कोई मेरा उपहास करे,
तो वह केवल हवा का शोर लगता है।
क्योंकि जिसने जीवन के घाव सहे हों,
उसे तानों का वार कमजोर लगता है।
मेरे भीतर एक युद्ध चल रहा है,
जो दुनिया की नजरों से परे है।
मेरी मुस्कान के पीछे का संघर्ष
किसी महाकाव्य से कम नहीं है।
मैं हर दिन अपने दर्द को
एक नई शक्ति में बदलता हूँ।
हर आँसू को साहस बनाकर
अपने भविष्य की राह पर चलता हूँ।
क्योंकि मैंने समझ लिया है—
दर्द विनाश नहीं, निर्माण भी करता है।
जो आत्मा को झकझोर देता है,
वही उसे महान भी करता है।
आज मैं टूटा हुआ दिख सकता हूँ,
पर मेरा हौसला अभी जिंदा है।
मेरे सपनों की लौ अब भी
हर अंधेरे से लड़ने को जिंदा है।
एक दिन यही घाव मेरी पहचान बनेंगे,
यही संघर्ष मेरी कहानी बनेगा।
आज जो समय मुझे परख रहा है,
कल वही मेरी सफलता का पानी बनेगा।
मैं हार नहीं मानूँगा,
चाहे परिस्थितियाँ कितनी भी कठोर हों।
क्योंकि पर्वत भी झुक जाते हैं
जब इरादे मनुष्य के मजबूत हों।
और उस दिन,
जब मेरी मंजिल मेरे सामने होगी,
तब मैं मुस्कुराकर कहूँगा—
धन्यवाद उन सभी पीड़ाओं को,
जिन्होंने मुझे तोड़ने की कोशिश की,
क्योंकि उन्हीं ने मुझे
अटूट बनाना सिखाया।
मेरा दर्द इतना अधिक है भीतर,
कि अब दुनिया की बातें सुनाई नहीं देतीं।
मैं अपने लक्ष्य की धुन में इतना खो चुका हूँ,
कि अपमान की आवाजें
मेरे साहस से टकराकर लौट जाती हैं।
मैं दर्द का बंदी नहीं,
उसका विजेता बनकर उभरूँगा।
और चाहे कितनी भी लंबी रात हो,
मैं अपने सूरज तक अवश्य पहुँचूँगा।
रूपेश रंजन
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