मानो प्रतीक्षा नहीं, तो प्रेम कैसा?
मानो प्रतीक्षा नहीं,
तो प्रेम कैसा?
गर्मी में सूखे नहीं,
तो बारिश की बूँदों का क्या ही आनंद?
रात अँधेरी न हो,
तो भोर का उजाला कैसा?
दूरी न हो,
तो मिलन का एहसास कैसा?
तुमसे मिलने की आस में
जो दिन गुज़रते हैं,
वही तो मेरी मोहब्बत की उम्र बढ़ाते हैं।
तुम्हारी एक झलक के लिए
जो बेचैनी पलती है,
वही तो मेरे प्रेम को
साधारण से असाधारण बनाती है।
हर प्रतीक्षा में
तुम्हारा नाम खिलता है,
हर अधूरी साँस में
तुम्हारा एहसास मिलता है।
तुम्हें पाने की जल्दी नहीं,
तुम्हें चाहने का सौभाग्य चाहिए,
क्योंकि प्रेम मंज़िल नहीं,
एक सुंदर यात्रा है।
जिस तरह तपती धरती
पहली वर्षा को बाँहों में भर लेती है,
उसी तरह मेरा हृदय
तुम्हारे एक स्पर्श से
जी उठता है।
इसलिए यदि प्रतीक्षा है,
तो रहने दो,
यदि दूरी है,
तो रहने दो।
क्योंकि तुम्हारी राह देखते-देखते ही
मैंने प्रेम का अर्थ जाना है।
और सच कहूँ—
जिस प्रेम में प्रतीक्षा नहीं,
वह आकर्षण हो सकता है,
पर जिस प्रेम में प्रतीक्षा हो,
वह प्रार्थना बन जाता है।
Comments
Post a Comment