तुम पूछते हो, मैं तुम्हारे पास ही क्यों चला आता हूँ?

 Rupesh Ranjan tells:

तुम पूछते हो, मैं तुम्हारे पास ही क्यों चला आता हूँ?

प्यासा हूँ... कुएँ के पास ख़ुद चला आता हूँ।

तुम्हें क्या पता, तुम सिर्फ़ एक शख़्स नहीं, मेरी रूह की तसल्ली हो, मेरे बेचैन दिनों की मंज़िल हो।

जैसे भटका मुसाफ़िर दूर कहीं जलता हुआ चिराग़ देख उस ओर बढ़ जाता है, वैसे ही मेरा दिल हर राह छोड़कर तुम्हारी ओर चला आता है।

तुम्हारी बातों में न जाने कैसा सुकून है, कि दुनिया की सारी आवाज़ें तुम्हारे एक लफ़्ज़ के आगे खामोश हो जाती हैं।

मैं मजबूर नहीं हूँ, बस तुम्हारी मोहब्बत का असर है, वरना कौन हर रोज़ एक ही दर पर दस्तक देता है?

चाँद भी तो हर रात उसी आसमान में लौट आता है, नदी भी तो आख़िर समंदर तक पहुँच जाती है, फिर मेरी चाहत पर हैरानी कैसी, अगर मेरा दिल हर बार तुम्हारे पास चला आता है।

तुम पूछते हो मैं तुम्हारे पास ही क्यों आता हूँ?

क्योंकि... कुछ रिश्ते वजहों से नहीं, ज़रूरतों से भी नहीं, बल्कि धड़कनों से बंधे होते हैं।

और मेरी हर धड़कन का रास्ता, आकर तुम पर ही ख़त्म होता है।

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