आदत बदल लीजिए, समय बदल रहा है...
आदत बदल लीजिए, समय बदल रहा है,
हर मौन चेहरा अब सवाल कर रहा है।
जिसे सदियों तक चौखटों में बाँधा गया,
जिसके सपनों को परम्पराओं में साधा गया,
वही नारी आज अपनी पहचान लिख रही है,
अपने संघर्षों से नया विधान लिख रही है।
समाज को अक्सर एक झुकी हुई स्त्री भाती थी,
जो हर अन्याय पर भी चुप रह जाती थी,
जिसकी इच्छाओं का कोई मूल्य न होता था,
जिसके हिस्से का आकाश भी संकुचित होता था।
पर अब परिस्थितियाँ करवट ले चुकी हैं,
सोई हुई चेतनाएँ जागृत हो चुकी हैं।
अब वह प्रश्न भी करती है और उत्तर भी देती है,
अपने जीवन की दिशा स्वयं निर्धारित करती है।
उसकी उड़ान से यदि किसी को भय लगता है,
तो यह उसकी सफलता नहीं, सोच का संकट लगता है।
क्योंकि नारी का सशक्त होना विनाश नहीं होता,
बल्कि समाज के विकास का प्रकाश होता।
वह अब किसी स्वीकृति की प्रतीक्षा में नहीं है,
किसी कृपा या अनुमति की याचना में नहीं है।
उसने अपने सामर्थ्य को पहचान लिया है,
अपने आत्मविश्वास को सम्मान दिया है।
अब उसके निर्णय उसी के होंगे,
उसके सपने उसी के होंगे।
वह अपने पथ की स्वयं निर्माणकर्ता है,
अपने भाग्य की स्वयं शिल्पकार है।
याद रखिए, युग परिवर्तन की आहट आ चुकी है,
नारी की चेतना हर सीमा लाँघ चुकी है।
अब उसे दबाने की हर कोशिश व्यर्थ होगी,
क्योंकि उसकी आवाज़ ही आने वाले कल की शक्ति होगी।
वह केवल एक संबंध नहीं, एक विचार है,
वह केवल एक व्यक्ति नहीं, परिवर्तन का आधार है।
इसलिए आदत बदल लीजिए, दृष्टि बदल लीजिए,
नारी को कम नहीं, उसके साहस को पढ़ लीजिए।
क्योंकि अब वह खामोश कहानी नहीं लिखेगी,
वह अपने अधिकारों की जुबानी लिखेगी।
और इतिहास गवाह बनेगा इस परिवर्तन का—
कि नारी अब झुकेगी नहीं, अपना आकाश स्वयं चुनेगी।
Rupesh Ranjan
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