झूमते बादल, अब बरस जाओ... Rupesh Ranjan
झूमते बादल, अब बरस जाओ
झूमते बादल, अब बरस जाओ,
कि मौसम ने दुआओं के दीप जला रखे हैं।
फ़िज़ाओं में मोहब्बत की ख़ुश्बू तैरती है,
और राहों ने उसके क़दमों के निशाँ सजा रखे हैं।
बरसो कि मेरा महबूब आज तन्हा निकले,
बिना छतरी, बिना किसी आसरे के चले।
बारिश की नर्म बूंदें उसके रुख़्सार छू लें,
और ज़ुल्फ़ों पर मोतियों-सी चमक पिघले।
भीग जाए वो इस तरह कि समाँ ठहर जाए,
हर क़तरा उसकी अदाओं का गवाह बन जाए।
लबों पर कोई मासूम-सी मुस्कुराहट उभरे,
और दिल मेरा उसी लम्हे में फ़ना हो जाए।
झूमते बादल, कुछ ऐसा करम बरसा देना,
उसके आँचल में चाँदनी का नूर भर देना।
जब वो भीगी हुई पलकों को उठाकर देखे,
मेरे ख़्वाबों को उसकी निगाहों का घर दे देना।
बरसो कि उसके जिस्म से मिट्टी की महक आए,
बरसो कि हर तरफ़ इश्क़ की रुत उतर आए।
बरसो कि मेरी तड़प को सुकून मिल जाए,
मेरा महबूब भीग जाए... और दिल निखर जाए।
फिर किसी शाम वो बारिश को याद करके कहे—
"कितनी हसीन थी वो रुत, कितनी दिलकश थी फ़िज़ा,"
और मैं चुपके से हवाओं में मुस्कुरा उठूँ,
कि झूमते बादलों ने मेरी दुआ सुन ली थी ज़रा।
Rupesh Ranjan
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