हम ही अँधेरा हैं....

हम ही अँधेरा हैं


हम ही अँधेरा हैं,

अँधेरे को कोसना बंद करो।

दीवारों पर इल्ज़ाम लिखने से पहले,

अपने भीतर का सच पढ़ो।


हम उजाले नहीं हैं,

उजाला हमारा सपना है।

सपना जो नींद में नहीं,

संघर्ष की खुली आँखों में पलता है।


मत पूछो कि सूरज कब निकलेगा,

पहले यह पूछो—

कितनी रातें तुमने

अपने डर के साथ काटी हैं?


दीया बनने की बातें बहुत हुईं,

अब आग बनकर जलना सीखो।

जो राख से भी उठ खड़ा हो,

वही नया सवेरा लिखता है।


अँधेरा कोई दुश्मन नहीं,

वह आईना है—

जिसमें हमारी कायरता,

हमारी चुप्पी,

हमारी हार दिखाई देती है।


जिस दिन हमने

अपने भीतर की रात से लड़ना सीख लिया,

उसी दिन

क्षितिज पर सूरज जन्म लेगा।


याद रखो—

उजाला आसमान से नहीं उतरता,

उजाला इंसानों के इरादों से जन्म लेता है।


इसलिए

अँधेरे को कोसना बंद करो।

अगर सच में रोशनी चाहिए,

तो खुद को बदलो,

खुद को जलाओ,

खुद को गढ़ो।


क्योंकि—


हम ही अँधेरा हैं।

और एक दिन,

हम ही उजाला बनेंगे।


रूपेश रंजन...

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