फूल बेचो, फूल खरीदो
फूल बेचो, फूल खरीदो
फूल बेचो, फूल खरीदो,
नफ़रत का व्यापार न करो।
प्यार की खुशबू घर-घर बाँटो,
मन में कोई दीवार न करो।
जहाँ काँटे बोए जाते हैं,
वहाँ आँसू ही उगते हैं।
जहाँ फूलों की खेती होती,
वहाँ सपने भी हँसते हैं।
फूल किसी का धर्म नहीं,
फूल किसी की जात नहीं।
इनकी भाषा प्रेम की भाषा,
इनकी कोई औकात नहीं—
बस मुस्कानों का संदेश लिए,
हर दिल तक ये जाते हैं।
फूल बेचो, फूल खरीदो,
ज़हर भरे शब्द छोड़ दो।
घृणा की सूखी डालों पर,
आशा के नव फूल जोड़ दो।
बच्चों के हाथों में कलियाँ हों,
युवाओं के हाथों में विश्वास।
बुज़ुर्गों की आँखों में उजियारा,
हर चेहरे पर जीवन का प्रकाश।
दुनिया बाज़ारों से नहीं,
दिलों से खूबसूरत होती है।
एक फूल की सच्ची ख़ुशबू,
हज़ार तलवारों पर भारी होती है।
आओ ऐसा युग रच डालें,
जहाँ हर आँगन महके फिर।
हर इंसान इंसान बने,
कोई दिल न बहके फिर।
फूल बेचो, फूल खरीदो,
यही हमारी पहचान बने।
प्रेम, करुणा और सद्भाव से,
भारत का हर इंसान बने।
रूपेश रंजन...
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