किस-किस को रोकोगे?

किस-किस को रोकोगे?


कितनों का मुँह बंद करोगे?

किस-किस को बोलने से रोकोगे?


एक आवाज़ दबाओगे,

हज़ार सवाल जन्म लेंगे।

एक सच छिपाओगे,

लाखों आईने सामने खड़े मिलेंगे।


कलम को कैद करोगे,

तो दीवारें लिखने लगेंगी।

ज़ुबानें सिल दोगे,

तो आँखें बोलने लगेंगी।


सच हवा है,

मुट्ठी में क़ैद नहीं होता।

विचार नदी है,

बाँधों से हमेशा नहीं रुकता।


डर की उम्र बहुत छोटी होती है,

हौसलों का इतिहास लंबा होता है।

सिंहासन बदल जाते हैं,

लेकिन सच का सूरज फिर उगता है।


तुम पहरे बढ़ाते रहो,

हम हिम्मत बढ़ाते रहेंगे।

तुम आवाज़ें गिनते रहो,

हम कारवाँ बनाते रहेंगे।


याद रखो—


कितनों का मुँह बंद करोगे?

किस-किस को बोलने से रोकोगे?


जब पूरा युग बोल उठेगा,

तो सन्नाटा ही हार जाएगा।

और जिस दिन जनता सच के साथ खड़ी होगी,

उस दिन हर डर,

हर झूठ,

हर अत्याचार

अपने ही बोझ तले बिखर जाएगा।


रूपेश रंजन

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