प्रेम के नाम पर खोती हुई दुनिया...
प्रेम के नाम पर खोती हुई दुनिया
उसने प्रेम किया था,
किसी कैद की चाह में नहीं,
बल्कि उस खुले आकाश के लिए
जहाँ दो आत्माएँ
एक-दूसरे के पंख बनती हैं।
पर धीरे-धीरे
प्रेम का अर्थ बदलने लगा।
उससे कहा गया—
"बस मेरी बनकर रहो,
दुनिया से क्या लेना?"
और उसने मुस्कुराकर
अपने कई रास्ते छोड़ दिए।
फिर कहा गया—
"तुम्हें मेरी कसम,
उन लोगों से कम मिला करो।"
उसने रिश्तों की धूप समेट ली,
अपने ही आँगन में
सन्नाटे उगने दिए।
फिर कहा गया—
"तुम्हारे सपनों से पहले
हमारा रिश्ता है।"
उसने अपनी उड़ान को
अलमारी में टाँग दिया,
डिग्रियाँ किताबों में सो गईं,
और इच्छाएँ
तकिए के नीचे दम तोड़ने लगीं।
उसे लगा—
यही प्रेम है।
क्योंकि त्याग को
उसे बचपन से
स्त्री का सबसे बड़ा आभूषण बताया गया था।
वह हर दिन
थोड़ी-थोड़ी कम होती गई।
उसकी हँसी छोटी हो गई,
बातें सीमित हो गईं,
आँखों की चमक
अनुमतियों की मोहताज हो गई।
वह पूछती भी नहीं थी अब,
सिर्फ़ इजाज़त माँगती थी।
और एक दिन
उसे एहसास हुआ—
उसके पास
सब कुछ था...
सिवाय
अपने होने के।
प्रेम यदि
तुम्हारी पहचान मिटा दे,
तो वह प्रेम नहीं,
धीरे-धीरे लिखी जा रही
एक अदृश्य कैद है।
प्रेम यदि
तुम्हारे सपनों से कहे—
"चुप रहो",
तो समझ लेना
किसी ने मोहब्बत की भाषा में
स्वार्थ का व्याकरण लिख दिया है।
सच्चा प्रेम
तुम्हारी उड़ान से नहीं डरता।
वह तुम्हारे पंख काटकर
तुम्हें अपना नहीं बनाता,
बल्कि तुम्हारी उड़ान में
अपना विश्वास जोड़ता है।
वह तुम्हारे मित्र नहीं छीनता,
तुम्हारे परिवार से नहीं लड़वाता,
तुम्हारे निर्णयों पर
ताले नहीं लगाता।
वह तुम्हारी आवाज़ को
और बुलंद करता है।
वह कहता है—
"जाओ, अपने सपने पूरे करो।
मैं तुम्हारे साथ हूँ।"
प्रेम वह नहीं
जो तुम्हें दुनिया से दूर कर दे।
प्रेम वह है
जो तुम्हें अपने और दुनिया—
दोनों के और करीब ले आए।
याद रखो,
बंधन और अपनापन
एक जैसे शब्द नहीं होते।
समर्पण और आत्म-विस्मरण
एक ही बात नहीं होती।
विश्वास और नियंत्रण
दो अलग-अलग रास्ते हैं।
जिस दिन
प्रेम तुम्हें
अपने ही आईने में
अजनबी बना दे,
उस दिन
थोड़ा ठहरना...
और अपने आप से पूछना—
क्या मैंने प्रेम पाया है,
या
मैंने अपने अस्तित्व की कीमत पर
किसी और की सुविधा खरीद ली है?
क्योंकि प्रेम का सबसे सुंदर रूप
किसी को खो देना नहीं,
बल्कि
दो सम्पूर्ण व्यक्तियों का
एक-दूसरे की स्वतंत्रता,
सम्मान, सपनों और पहचान को
सहेजते हुए
जीवन भर
साथ चलना है।
यही प्रेम है—
जहाँ हाथ थामे जाते हैं,
पर पंख नहीं बाँधे जाते।
जहाँ दिल मिलते हैं,
पर अस्तित्व नहीं खोता।
और जहाँ "हम" बनने की राह में
"मैं" कभी मरता नहीं।
रूपेश रंजन
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