जुलाई की पहली बारिश...

 जुलाई की पहली बारिश


जुलाई की पहली बारिश

आज भी खिड़की पर दस्तक देती है,

मगर भीगता अब तन नहीं,

यादों का आँगन भीग जाता है।


याद आते हैं वे दिन,

जब नया बस्ता किसी ख़ज़ाने से कम न था,

नई किताबों की स्याही में

सपनों की खुशबू बसती थी।


कॉपियों के पहले पन्ने पर

अपने नाम को सबसे सुंदर लिखने की होड़,

हर अक्षर में छिपा होता था

एक नया साल, एक नई उम्मीद।


बारिश की पहली बूँद पड़ते ही

छाता बोझ लगने लगता था,

और सड़क पर बने छोटे-छोटे गड्ढे

समंदर नज़र आते थे।


माँ की डाँट से बचते हुए भी

कीचड़ में छलाँग लगाने का साहस,

भीगे जूतों की परवाह नहीं,

बस दोस्तों की हँसी सबसे बड़ी दौलत थी।


स्कूल की घंटी,

कक्षा की खिड़की से आती ठंडी हवा,

और बारिश देखते हुए

किसी कहानी में खो जाने का सुख...


तब वक्त घड़ी से नहीं,

छुट्टी की घंटी से चलता था।

ख़ुशियाँ पैसों से नहीं,

एक टॉफी और आधी छुट्टी से मिल जाती थीं।


आज बारिश वैसी ही है,

बादल भी वही हैं,

मिट्टी की खुशबू भी वही है,

बस बदल गए हैं हम।


अब हाथों में खिलौने नहीं,

ज़िम्मेदारियों की फाइलें हैं।

अब बारिश में भीगने से पहले

मोबाइल और कपड़ों की चिंता होती है।


कभी सोचता हूँ,

क्या सचमुच बचपन चला गया,

या वह आज भी कहीं

मेरे ही भीतर बैठा है...


शायद हर बारिश

उसे पुकारने आती है,

और वह मुस्कुराकर कहता है—

"मैं यहीं हूँ...

बस तुम बड़े होने की जल्दी में

मुझे पीछे छोड़ आए हो।"


रूपेश रंजन

Comments

Popular Posts